आर्थिक मामलों के विभाग (DEA) की सचिव अनुराधा ठाकुर ने साफ किया है कि भारत को ग्लोबल फाइनेंशियल हब बनाने के लिए घरेलू बचत को फिजिकल एसेट्स से निकालकर फॉर्मल फाइनेंशियल मार्केट्स में लाना बेहद जरूरी है। इस बड़े बदलाव में GIFT-IFSC एक महत्वपूर्ण ब्रिज का काम करेगा।
भारत अब एक बड़े विजन पर काम कर रहा है। 13वें SBI बैंकिंग और इकोनॉमिक्स कॉन्क्लेव में DEA सचिव अनुराधा ठाकुर ने जोर दिया कि देश की लॉन्ग-टर्म ग्रोथ के लिए घरेलू पूंजी का मोबिलाइजेशन (Mobilization) सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
क्यों जरूरी है यह बदलाव?
आज भी भारतीय परिवारों की बड़ी संपत्ति सोने (Gold) और रियल एस्टेट जैसे फिजिकल एसेट्स में फंसी है। इसे इक्विटी, बॉन्ड्स और म्यूचुअल फंड्स जैसे फॉर्मल फाइनेंशियल चैनल्स में लाना वक्त की मांग है। इससे न केवल मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ेगी, बल्कि भारतीय कैपिटल मार्केट को और भी गहराई मिलेगी। सरकार का मुख्य मकसद लोगों का भरोसा उन संस्थानों पर बनाना है, ताकि वे अपनी बचत को अधिक प्रोडक्टिव चैनल्स में निवेश कर सकें।
GIFT-IFSC की भूमिका
गुजरात में स्थित GIFT-IFSC को इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए एक टेस्टिंग ग्राउंड के तौर पर देखा जा रहा है। यह घरेलू रिफॉर्म्स और ग्लोबल इन्वेस्टर्स के बीच एक मजबूत कड़ी का काम कर रहा है। लंदन और न्यूयॉर्क जैसे ग्लोबल हब के साथ मुकाबला करने के लिए भारत एक ऐसा स्टेबल रेगुलेटरी माहौल तैयार कर रहा है जो विदेशी निवेशकों को भी आकर्षित करे और घरेलू रिटेल निवेशकों का भरोसा भी बढ़ाए।
अनुराधा ठाकुर ने स्पष्ट किया कि यह कोई रातों-रात होने वाला बदलाव नहीं है। यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसके लिए रेगुलेटरी स्पष्टता और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' पर निरंतर ध्यान देना जरूरी है। निवेशकों के लिए यह एक संकेत है कि भविष्य में अर्थव्यवस्था के और अधिक औपचारिक (Formal) होने की संभावना है।
