भारत ने साल 2045 तक अपने विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए **8-9%** की सालाना आर्थिक वृद्धि दर का लक्ष्य रखा है। इसे ट्रैक करने के लिए सरकार **2028-29** तक नेशनल अकाउंटिंग स्टैंडर्ड्स में बड़े बदलाव करने जा रही है।
भारत सरकार ने आने वाले दो दशकों के लिए एक बड़ा आर्थिक खाका तैयार किया है। सांख्यिकी सचिव सौरभ गर्ग के मुताबिक, 2045 तक देश के विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए 8-9% की निरंतर जीडीपी ग्रोथ जरूरी है। इस तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था को सही ढंग से समझने के लिए सरकार अब मापने के पुराने तरीकों को बदलने की तैयारी कर रही है।
बदलेगा नेशनल अकाउंटिंग फ्रेमवर्क
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय 2028-29 के फाइनेंशियल ईयर तक देश के अकाउंटिंग सिस्टम को पूरी तरह बदलने की योजना पर काम कर रहा है। अभी तक जीडीपी को ही आर्थिक सेहत का मुख्य पैमाना माना जाता रहा है, लेकिन अब इसमें उन अनकहे फैक्टर्स को भी जोड़ा जाएगा जो आज की अर्थव्यवस्था की असली ताकत हैं।
डेटा और नेचुरल कैपिटल की नई भूमिका
इस नए बदलाव में 'डेटा' को उत्पादन का एक मुख्य कारक (Factor of Production) माना जाएगा। डिजिटल युग में डेटा अपने आप में एक स्वतंत्र आर्थिक वैल्यू पैदा करता है, जिसे अब सरकारी आंकड़ों में शामिल किया जाएगा। साथ ही, विकास की कीमत को नापने के लिए 'नेचुरल रिसोर्स डिप्लीशन' (प्राकृतिक संसाधनों की कमी) को भी घटाया जाएगा। यह कदम ग्लोबल 'ग्रीन जीडीपी' पहल के अनुरूप है, जिससे विकास के साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की साफ तस्वीर सामने आएगी।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
इन्वेस्टर्स के लिए यह बदलाव लॉन्ग टर्म प्लानिंग में काफी मददगार साबित हो सकता है। जब सरकार विकास को केवल जीडीपी तक सीमित न रखकर वेल-बीइंग और सस्टेनेबिलिटी से जोड़कर देखेगी, तो कंपनियों के बीच सस्टेनेबल और डिजिटल ग्रोथ को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। निवेशकों को सलाह है कि वे 2028-29 से होने वाले इन बदलावों पर नजर रखें, क्योंकि इससे आने वाले समय में सेक्टोरल परफॉरमेंस को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल जाएगा।
