भारत ने साल 2036 तक अपने रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) खर्च को GDP के **2%** तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। वित्त वर्ष 2023-24 में यह आंकड़ा **0.84%** पर था।
भारत सरकार ने रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) के मोर्चे पर बड़ा कदम उठाते हुए 2036 तक इसे GDP का 2% करने का महत्वाकांक्षी रोडमैप तैयार किया है। साल 2023-24 में देश का कुल R&D खर्च (GERD) करीब ₹2.45 लाख करोड़ रहा, जो कि GDP का 0.84% है। साल 2020-21 में यह आंकड़ा 0.64% था, यानी विकास की रफ्तार तो है, लेकिन लक्ष्य अभी भी दूर है।
प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी और चुनौतियां
बदलाव की एक बड़ी तस्वीर यह है कि अब रिसर्च फंडिंग में प्राइवेट सेक्टर की हिस्सेदारी बढ़कर 51.8% हो गई है। हालांकि, इसमें एक पेच है—इस खर्च का 71% से ज्यादा हिस्सा मल्टीनेशनल कॉरपोरेशन (MNCs) से आ रहा है। इसका मतलब यह है कि देश में होने वाली ज्यादातर हाई-एंड रिसर्च ग्लोबल ऑर्डर्स पर आधारित है, न कि स्थानीय स्तर पर औद्योगिक नवाचार (Industrial Innovation) पर। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि कैसे छोटी और मध्यम स्तर की कंपनियां (MSMEs) इस दायरे में आती हैं।
टैक्स इंसेंटिव्स: क्या वापस लौटेंगे अच्छे दिन?
नवाचार की रफ्तार पर सरकारी नीतियों का सीधा असर पड़ता है। पहले R&D के लिए 200% टैक्स डिडक्शन मिलता था, जो घटकर अब 100% रह गया है। जानकारों का मानना है कि इस कटौती ने छोटी कंपनियों की नई तकनीक विकसित करने की हिम्मत को थोड़ा कम किया है, क्योंकि इससे सीधे तौर पर उनके नेट प्रॉफिट और कैश फ्लो पर असर पड़ता है। मार्केट जानकारों का मानना है कि अगर भविष्य में टैक्स छूट के नए नियम आते हैं, तो यह कंपनियों के लिए बड़ा ट्रिगर बन सकता है।
नए फंड्स और आगे का रास्ता
सरकार ने नवाचार को बढ़ावा देने के लिए ₹1 लाख करोड़ का रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन (RDI) फंड और 'अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन' (ANRF) जैसी पहल शुरू की है। निवेशकों के लिए सलाह है कि वे अपने पोर्टफोलियो की कंपनियों के 'R&D-टू-रेवेन्यू' अनुपात पर नजर रखें। लंबी अवधि में भारत का सर्विस-बेस्ड इकॉनमी से हटकर एक टेक्नोलॉजी-लीड औद्योगिक पावर बनना इसी बात पर निर्भर करेगा कि ये कंपनियां कितनी तेजी से इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) तैयार कर पाती हैं।
