सरकार अब 120 ऐसे प्रोडक्ट्स की पहचान कर रही है, जिन्हें विदेश से मंगाने के बजाय भारत में ही बनाया जाएगा। इसमें कैपिटल गुड्स और केमिकल्स जैसे अहम सेक्टर शामिल हैं, जो निवेशकों के लिए नए मौके खोल सकते हैं।
भारत सरकार का डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (DPIIT) एक नई रणनीति पर काम कर रहा है। इसका मकसद भारत को इम्पोर्टर से मैन्युफैक्चरर के तौर पर स्थापित करना है, ताकि क्रिटिकल कैपिटल गुड्स, मेडिकल टेक्नोलॉजी और हाई-एंड केमिकल्स के लिए सप्लाई चेन की निर्भरता खत्म की जा सके।
सरकार की थ्री-पिलर रणनीति
सरकार इस बड़े बदलाव के लिए तीन मोर्चों पर काम करेगी। पहला, नए घरेलू मैन्युफैक्चरर्स को सस्ती विदेशी चीजों से बचाने के लिए कस्टम ड्यूटी में बदलाव किया जा सकता है। दूसरा, Production Linked Incentive (PLI) स्कीम की तर्ज पर कंपनियों को फाइनेंशियल सपोर्ट दिया जाएगा। और तीसरा, उन सेक्टर्स में रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर फोकस किया जाएगा जहां भारत के पास फिलहाल लेटेस्ट टेक्नोलॉजी की कमी है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
इन्वेस्टर्स के लिए यह खबर काफी अहम है, खासकर इंडस्ट्रियल कैपिटल गुड्स और स्पेशलिटी केमिकल कंपनियों के लिए। हालांकि, इन सेक्टर्स में चुनौती 'लॉन्ग जेस्टेशन पीरियड' की है, यानी प्रोजेक्ट से मुनाफा शुरू होने में लंबा समय लगता है और इसमें भारी-भरकम इन्वेस्टमेंट की जरूरत होती है। पिछली बार सोलर और बैटरी स्टोरेज प्रोजेक्ट्स में कई कंपनियों ने केवल असेंबली पर ध्यान दिया था, लेकिन अब सरकार वैल्यू चेन के डीप इंटीग्रेशन पर जोर दे रही है।
रिस्क फैक्टर्स: सावधानी जरूरी
निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इन प्रोजेक्ट्स के लिए बड़ा कैपिटल खर्च (Capex) कंपनी पर कर्ज का बोझ बढ़ा सकता है। साथ ही, ग्लोबल लेवल पर रॉ मटेरियल की कीमतों में उतार-चढ़ाव कंपनी के मार्जिन को दबा सकते हैं। प्रोजेक्ट में देरी या कॉस्ट ओवररन का रिस्क भी बना रहेगा। बाजार अब सरकार द्वारा 120 आइटम्स की फाइनल लिस्ट और उनके लिए तय किए गए बजट का इंतजार कर रहा है। कंपनियों के बैलेंस शीट मैनेजमेंट पर नजर रखना ही इस दौर में निवेश का सबसे सही तरीका होगा।
