वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पढ़ाई और इंडस्ट्री की जरूरतों के बीच की खाई को पाटने पर जोर दिया है। हर साल करोड़ों युवाओं के मार्केट में आने के मद्देनजर, सरकार 'PM Internship Scheme' जैसे कई अहम रिफॉर्म्स ला रही है ताकि युवाओं को बेहतर रोजगार मिल सके।
भारत सरकार अब उच्च शिक्षा और इंडस्ट्री की जरूरतों के बीच के अंतर को खत्म करने पर पूरा फोकस कर रही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसे लेकर लगातार सतर्कता बरत रही हैं। हर साल अर्थव्यवस्था में 70 से 80 लाख नए वर्कर जुड़ रहे हैं, लेकिन पारंपरिक डिग्रियों और कंपनियों को चाहिए तकनीकी स्किल्स के बीच बड़ा अंतर दिख रहा है, जो अब इकोनॉमिक प्रायोरिटी बन चुका है।
इंडस्ट्री के साथ जुड़ाव पर जोर
सरकार अब डिग्री-आधारित मॉडलों से हटकर इंडस्ट्री-अलाइन स्किल्स की ओर बढ़ रही है। इसका मुख्य केंद्र PM Internship Scheme है, जो छात्रों को ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग मुहैया कराती है। इसके अलावा, हालिया बजट में इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के पास यूनिवर्सिटी टाउनशिप बनाने और स्कूलों में 'कंटेंट क्रिएटर लैब्स' खोलने को प्राथमिकता दी गई है। इन सबका मकसद यूनिवर्सिटीज को रिसर्च और सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बायोटेक्नोलॉजी जैसे हाई-ग्रोथ क्षेत्रों में तकनीकी विकास का हब बनाना है।
रोजगार की आर्थिक चुनौती
निवेशकों के लिए यह बदलाव बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह देश की लॉन्ग-टर्म प्रोडक्टिविटी को प्रभावित करता है। हालांकि भारत का सर्विस और टेक्नोलॉजी सेक्टर बढ़ रहा है, लेकिन अभी यह खेती से आने वाले लेबर फोर्स को पूरी तरह समाहित करने में सक्षम नहीं है। जानकारों का कहना है कि भारत को अपनी क्षमता हासिल करने के लिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का विस्तार करना होगा, जिसके लिए STEM स्किल्स से लैस वर्कफोर्स की जरूरत है।
रिस्क और आगे क्या देखना है?
इन सुधारों की राह में सबसे बड़ी चुनौती 'एग्जीक्यूशन' (कार्यान्वयन) की है। सरकारी स्तर पर करिकुलम में बदलाव करना और प्राइवेट सेक्टर के साथ तालमेल बिठाना आसान नहीं होगा। अगर इंडस्ट्री सिर्फ नाम के लिए इंटर्नशिप प्रोग्राम चलाती है, तो इसका फायदा छात्रों को नहीं मिलेगा। निवेशक अब इन स्कीम्स के तहत होने वाली हायरिंग के आंकड़ों और बड़ी कंपनियों की भागीदारी पर नजर रखेंगे, क्योंकि इसी से तय होगा कि भारत आने वाले वर्षों में ग्लोबल मार्केट में कितना कॉम्पिटिटिव रहता है।
