भारत ने फाइनेंशियल ईयर 2022 से 2026 के बीच **7.9%** की औसत जीडीपी ग्रोथ दर्ज की है। मजबूत घरेलू खपत और IBC जैसे बड़े रिफॉर्म्स ने इस तेजी को हवा दी है। अब नजरें एनर्जी इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने और **1.2 अरब** की वर्कफोर्स के प्रबंधन पर टिकी हैं।
आर्थिक मजबूती के पीछे के कारण
भारत की अर्थव्यवस्था ने ग्लोबल उतार-चढ़ाव के बावजूद शानदार प्रदर्शन किया है। 7.9% की औसत सालाना ग्रोथ केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि इसके पीछे GST कलेक्शन, बिजली उत्पादन और फ्रेट ट्रैफिक जैसे ठोस इंडिकेटर्स हैं, जो दिखाते हैं कि यह तेजी इंडस्ट्रियल और सर्विस, दोनों सेक्टर में चौतरफा है।
स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स का बड़ा असर
सरकार द्वारा उठाए गए सुधारों का सीधा फायदा कॉर्पोरेट सेक्टर को मिल रहा है। Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) ने अटके हुए एसेट्स की समस्या को सुलझाया है, जबकि डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर ने फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन को बेहद आसान बना दिया है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा प्लस पॉइंट है, क्योंकि इससे 'कॉस्ट ऑफ डूइंग बिजनेस' कम हो रहा है और कॉर्पोरेट मार्जिन में सुधार की संभावना बढ़ रही है।
एनर्जी सिक्योरिटी और भविष्य की रणनीति
अब देश का फोकस एनर्जी इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने पर है। परमाणु ऊर्जा, घरेलू खोज और स्पेस टेक्नोलॉजी में निवेश बढ़कर अब एक रणनीतिक लक्ष्य बन चुका है। निवेशकों को उन कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जो वैकल्पिक ऊर्जा और डोमेस्टिक प्रोडक्शन में काम कर रही हैं, क्योंकि इन्हें भविष्य में सरकार से भारी सपोर्ट मिल सकता है।
1.2 अरब लोगों की विशाल वर्कफोर्स
अगले एक दशक में 1.2 अरब लोगों की विशाल वर्कफोर्स को अर्थव्यवस्था में शामिल करना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इन्हें सही स्किल्स के साथ इंडस्ट्रियल सेक्टर में एडजस्ट करना ही रिटेल, बैंकिंग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में डिमांड का मुख्य ड्राइवर होगा।
क्या है आगे का रास्ता?
India and Emerging Economic Order Forum (IEOF) जैसे प्लेटफॉर्म अब क्लाइमेट फाइनेंस और इनोवेशन पर जोर दे रहे हैं। आने वाले समय में ग्लोबल ट्रेड और फाइनेंसिंग कॉस्ट कैसे बदलती है, यह देखना निवेशकों के लिए मार्केट की लॉन्ग-टर्म हेल्थ समझने के लिहाज से बेहद जरूरी होगा।
