भारतीय राज्यों पर मंडराया वित्तीय संकट: सैलरी और पेंशन के बोझ से थम सकती है विकास की रफ्तार

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारतीय राज्यों पर मंडराया वित्तीय संकट: सैलरी और पेंशन के बोझ से थम सकती है विकास की रफ्तार

भारत के कई राज्यों पर भारी वित्तीय संकट गहरा गया है। इनकी कुल कमाई का लगभग **90%** हिस्सा सैलरी, पेंशन और फिक्स्ड खर्चों में जा रहा है। इस मजबूरी के कारण इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर कैंची चल रही है, जो भविष्य के आर्थिक विकास के लिए बड़ा खतरा है।

फिक्स्ड खर्चों का मकड़जाल

राज्यों की आर्थिक सेहत केवल कर्ज के आंकड़ों से नहीं, बल्कि उनके फिक्स्ड ऑब्लिगेशंस से तय हो रही है। नई सड़कें, स्कूल और अस्पतालों पर खर्च (कैपिटल एक्सपेंडिचर) अब उन अनिवार्य देनदारियों के तले दब गया है, जिनमें सरकारी सैलरी, पेंशन और पुराने कर्ज का ब्याज शामिल है।

विकास की रफ्तार पर ब्रेक

जब कमाई का 90% हिस्सा पहले से ही फिक्स खर्चों में बंधा हो, तो राज्य सरकारों के पास कोई लचीलापन नहीं बचता। इसका सीधा असर विकास कार्यों पर पड़ता है। नतीजतन, सरकारें या तो प्रोजेक्ट्स रोकती हैं या फिर कर्ज का सहारा लेती हैं। इसका अर्थ यह है कि राज्य आज के खर्चों को पूरा करने के लिए अपने भविष्य के विकास से समझौता कर रहे हैं।

कर्ज का बढ़ता दबाव

राज्यों का कुल फिस्कल डेफिसिट का 76% हिस्सा मार्केट बॉरोइंग (बाजार से कर्ज) के जरिए पूरा किया जा रहा है। पंजाब और केरल जैसे राज्यों में ब्याज और पेंशन का बोझ इतना अधिक है कि वे महंगाई या फ्यूल प्राइस जैसे बाहरी झटकों को सहने की स्थिति में भी नहीं हैं। इसके अलावा, पब्लिक सेक्टर लोन पर दी गई सरकारी गारंटी 'हिडन डेट' का खतरा पैदा कर रही है।

16वें फाइनेंस कमीशन पर नजर

अब सबकी निगाहें 16वें फाइनेंस कमीशन पर टिकी हैं, जो 2026-27 के फाइनेंशियल ईयर से प्रभावी होगा। यह कमीशन तय करेगा कि केंद्र और राज्यों के बीच टैक्स रेवेन्यू कैसे बंटेंगे। इसके फैसले राज्यों की वित्तीय स्वतंत्रता और उनकी भविष्य की नीतियों की दशा और दिशा तय करेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.