भारत अब अपनी क्रिटिकल मिनरल नीति में बड़ा बदलाव कर रहा है। सरकार केवल कच्चे माल का स्टॉक जमा करने के बजाय घरेलू प्रोसेसिंग क्षमता को बढ़ाने पर फोकस कर रही है। इसके तहत **₹7,280 करोड़** की एक नई योजना शुरू की गई है, जो रेयर अर्थ मैग्नेट (Rare Earth Magnets) के उत्पादन पर आधारित है।
मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम पर सरकार का फोकस
नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) के तहत, सरकार का मानना है कि वास्तविक आर्थिक सुरक्षा केवल स्टॉक जमा करने से नहीं, बल्कि खनिजों को रिफाइन करके उन्हें हाई-परफॉरमेंस औद्योगिक पुर्जों में बदलने की तकनीकी क्षमता से आएगी। नवंबर 2025 में मंजूर की गई ₹7,280 करोड़ की स्कीम का मुख्य लक्ष्य 6,000 MTPA की इंटीग्रेटेड प्रोडक्शन क्षमता तैयार करना है।
यह कदम खास तौर पर इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और विंड टर्बाइन में इस्तेमाल होने वाले रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स (REPMs) के लिए उठाया गया है।
क्यों बदली रणनीति?
कच्चे माल का बड़ा भंडार रखना हमेशा फायदेमंद नहीं होता। इससे फंड ब्लॉक होता है और कीमतों में उतार-चढ़ाव (price volatility) का रिस्क बना रहता है। इसके अलावा, अगर स्टॉक में मौजूद मिनरल ग्रेड और इंडस्ट्री की मांग के बीच तालमेल न हो, तो वह किसी संकट के समय काम नहीं आता। हालांकि, आपातकालीन स्थितियों के लिए सरकार ने अभी भी ₹500 करोड़ का एक छोटा फंड 'नेशनल क्रिटिकल मिनरल स्टॉकपाइल प्रोग्राम' के लिए सुरक्षित रखा है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
इस नई औद्योगिक नीति में 'एग्जीक्यूशन' सबसे बड़ा चैलेंज है। हाई-प्योरिटी मेटल प्रोडक्शन और रेयर अर्थ सेपरेशन के लिए न केवल एडवांस्ड टेक्नोलॉजी की जरूरत है, बल्कि विदेशी कंपनियों के साथ ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी भी जरूरी है।
- समय और एक्सपर्टाइज: इन प्रोजेक्ट्स का जेस्टेशन पीरियड काफी लंबा है।
- रेगुलेटरी चुनौतियां: पर्यावरणीय मंजूरी और खदानों से जुड़े नियमों का पालन करना इस सेक्टर के लिए ऐतिहासिक रूप से एक बड़ी रुकावट रहा है।
- सफलता का पैमाना: निवेशकों को अब कंपनियों के प्रोडक्शन टारगेट और टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप की प्रोग्रेस पर बारीकी से नजर रखनी होगी, क्योंकि भविष्य में मुनाफा खदानों की संख्या से नहीं, बल्कि सप्लाई चेन की मजबूती से तय होगा।
