भारत ने जीडीपी कैलकुलेशन के लिए आधिकारिक तौर पर **2022-23** को नया बेस ईयर बना लिया है। इसमें जीएसटी और ई-वाहन जैसे आधुनिक डेटा को शामिल किया गया है। हालांकि, इससे 'डिनोमिनेटर इफेक्ट' के कारण फिस्कल डेफिसिट और डेट-टू-जीडीपी रेशियो ऊंचे दिख सकते हैं।
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने जीडीपी के पुराने बेस ईयर 2011-12 को बदलकर अब 2022-23 कर दिया है। यह एक तकनीकी बदलाव है जिसका उद्देश्य देश की बदलती आर्थिक संरचना को सटीक रूप से पेश करना है। पुराने डेटा में डिजिटल सेवाओं, औपचारिक अर्थव्यवस्था और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की पूरी तस्वीर साफ नहीं हो पा रही थी, जिसे अब दुरुस्त किया जा रहा है।
डेटा में आधुनिकता का समावेश
सरकार ने अब सटीक डेटा के लिए जीएसटी फाइलिंग, ई-वाहन डेटा और प्रोड्यूसर प्राइस ट्रैकर्स जैसे नए स्रोतों को जोड़ा है। साथ ही, 'डबल डिफ्लेशन' पद्धति का उपयोग किया जा रहा है, जो गुड्स और सर्विसेज की महंगाई को अलग-अलग ट्रैक करती है। निवेशकों के लिए इसका मतलब यह है कि फिनटेक, लॉजिस्टिक्स और प्रोफेशनल सर्विसेज जैसे सेक्टर्स का योगदान अब बेहतर तरीके से दिखेगा।
क्या है 'डिनोमिनेटर इफेक्ट'?
यह बदलाव तकनीकी है, लेकिन इसका असर सरकारी वित्त (Public Finance) पर दिख सकता है। अनुमान है कि नॉमिनल जीडीपी के आंकड़े पुरानी सीरीज की तुलना में 3% से 4% तक कम हो सकते हैं। चूंकि अब जीडीपी का आकार (Denominator) पहले से छोटा दिख रहा है, इसलिए फिस्कल डेफिसिट और डेट-टू-जीडीपी रेशियो कागज पर ज्यादा नजर आ सकते हैं, भले ही सरकार ने कर्ज या खर्च में कोई बदलाव न किया हो।
तुलना करने में सावधानी
बाजार के जानकारों के लिए चुनौती यह है कि नई सीरीज और पुरानी सीरीज के आंकड़ों की सीधे तुलना नहीं की जा सकती। दोनों का बेस और वेटेज अलग है, इसलिए लॉन्ग-टर्म ट्रेंड्स को समझते समय आधिकारिक और कंसिस्टेंट डेटा पर ही भरोसा करना सही होगा।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को पुरानी और नई ग्रोथ दरों के बीच तालमेल बिठाने के बजाय, अब नए डेटा के जरिए सेक्टोरल परफॉर्मेंस (जैसे इंडस्ट्रियल आउटपुट और सर्विसेज) पर नजर रखनी चाहिए। अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक मजबूती को समझना अब हेडलाइन आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।
