India Semiconductor Plan: ₹1.27 लाख करोड़ के निवेश से भारत बनेगा चिप मैन्युफैक्चरिंग का हब

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
India Semiconductor Plan: ₹1.27 लाख करोड़ के निवेश से भारत बनेगा चिप मैन्युफैक्चरिंग का हब

भारत अपनी सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बढ़ाने के लिए सरकारी इंसेंटिव्स के तहत **₹1.27 लाख करोड़** का बड़ा निवेश कर रहा है। Tata Electronics और Applied Materials जैसी दिग्गज कंपनियों के आने से सेक्टर को रफ्तार मिल रही है, लेकिन निवेशकों को भारी कैपिटल खर्च और लंबे समय तक प्रॉफिट का इंतजार करने की चुनौती भी समझनी होगी।

भारत अब ग्लोबल सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का हिस्सा बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। Boston Consulting Group की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, जियो-पॉलिटिकल बदलाव और मजबूत टेक इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत भारत को चिप प्रोडक्शन के लिए एक आदर्श केंद्र के रूप में पेश कर रही है।

सरकारी प्रोत्साहन और पॉलिसी सपोर्ट

सरकार ने 'India Semiconductor Mission' के दूसरे चरण पर अपना ध्यान केंद्रित किया है, जिसके लिए ₹1.27 लाख करोड़ का आवंटन किया गया है। यह फंड सिर्फ असेंबली यूनिट्स तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका लक्ष्य मैन्युफैक्चरिंग इक्विपमेंट, हाई-प्योरिटी गैस और एडवांस्ड सबस्ट्रेट्स जैसे पूरे वैल्यू चेन को सपोर्ट करना है ताकि प्राइवेट प्लेयर्स के लिए एंट्री आसान हो सके।

कंपनियों का निवेश रोडमैप

प्राइवेट सेक्टर की दिलचस्पी बढ़ रही है। Applied Materials ने 2035 तक भारत में USD 5 बिलियन के निवेश की योजना बनाई है। वहीं, Lam Research ने ₹10,000 करोड़ के निवेश का प्रस्ताव दिया है। घरेलू स्तर पर, Tata Electronics गुजरात के धोलेरा में 363 एकड़ में एक विशाल सेमीकंडक्टर फैसिलिटी तैयार कर रही है।

AI और कंप्यूटिंग की बढ़ती मांग

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती जरूरतों के चलते एडवांस्ड ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स और मेमोरी चिप्स की डिमांड रिकॉर्ड स्तर पर है। लोकल प्रोडक्शन से न केवल सप्लाई चेन स्टैबिलिटी मिलेगी, बल्कि वैश्विक अस्थिरता से भी बचाव होगा।

निवेशकों के लिए चुनौतियां

सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में 'फैब' (fab) यूनिट्स लगाना बेहद चुनौतीपूर्ण है। इसके लिए भारी कैपिटल खर्च, स्थिर बिजली और पानी की भारी आपूर्ति जैसी बुनियादी जरूरतों की आवश्यकता होती है। यह एक लॉन्ग-साइकिल बिजनेस है, इसलिए निवेशकों को मुनाफे के लिए कई वर्षों का इंतजार करना पड़ सकता है। साथ ही, दुर्लभ गैसों और केमिकल्स के लिए आयात पर निर्भरता भी एक लंबी अवधि की चुनौती है।

क्या ट्रैक करें?

निवेशकों को धोलेरा जैसे प्रोजेक्ट्स की प्रगति, सरकारी सब्सिडी के वितरण की गति और वेंडर इकोसिस्टम के विस्तार पर नजर रखनी चाहिए। यह सेक्टर शॉर्ट-टर्म गेन्स के बजाय लॉन्ग-टर्म ग्रोथ का है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.