साल 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय बाजार से **₹2.60 लाख करोड़** की भारी निकासी की है। सस्ते वैल्यूएशन के बावजूद यह बिकवाली चिंता का विषय बनी हुई है, हालांकि प्राइमरी मार्केट यानी IPO में अब भी निवेशकों की रुचि बरकरार है।
भारतीय शेयर बाजार इस समय कीमत और सेंटीमेंट के बीच एक बड़े अंतर (disconnect) का सामना कर रहा है। 2026 में FPIs ने आक्रामक तरीके से भारतीय शेयरों को बेचा है, जिससे कुल ₹2.60 लाख करोड़ की नेट निकासी हुई है। दिलचस्प बात यह है कि Nifty 50 का वैल्यूएशन घटकर 20.5 के ट्रेलिंग अर्निंग्स मल्टीपल पर आ गया है, जिसे ऐतिहासिक रूप से सस्ता माना जाता है। इसके बावजूद, सेकेंडरी मार्केट में बिकवाली का दबाव थमता नहीं दिख रहा है।
ग्लोबल ट्रेंड और शिफ्टिंग प्राथमिकताएं
निवेशक अब इंडिया की ग्रोथ स्टोरी के बजाय ग्लोबल मैक्रो स्टेबिलिटी को अधिक महत्व दे रहे हैं। दुनिया भर का कैपिटल अब उन मार्केट्स की ओर शिफ्ट हो रहा है जिनका सीधा संपर्क सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) बूम से है, जैसे कि ताइवान और दक्षिण कोरिया। इसके अलावा, अमेरिका में ऊंचे ट्रेजरी यील्ड्स और मजबूत डॉलर ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को इमर्जिंग मार्केट्स में रिस्क लेने से डरा दिया है।
IPO मार्केट में अब भी उम्मीद
हालांकि विदेशी संस्थागत निवेशक अपने पुराने होल्डिंग्स को बेच रहे हैं, विशेषकर फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर से, लेकिन वे पूरी तरह से भारतीय बाजार से बाहर नहीं निकले हैं। प्राइमरी मार्केट यानी IPO की स्थिति अब भी बेहतर है, जो यह दर्शाता है कि ग्लोबल फंड्स अब भी नए लिस्टिंग्स में वैल्यू तलाश रहे हैं और उन्हें सेकेंडरी मार्केट की लिक्विड होल्डिंग्स से अलग तरह से देख रहे हैं।
रिस्क फैक्टर्स और आगे की राह
क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें भारत के फिस्कल पोजीशन और कॉर्पोरेट मार्जिन के लिए खतरा बनी हुई हैं। इसके साथ ही, जब तक भारतीय कंपनियां ग्लोबल मैक्रो दबावों से बेहतर अर्निंग्स ग्रोथ नहीं दिखातीं, बाजार में उतार-चढ़ाव बना रहेगा। मिडिल ईस्ट में जारी भू-राजनीतिक तनाव भी विदेशी निवेशकों के रिस्क एपेटाइट को प्रभावित कर रहा है। निवेशकों को अब अगली अर्निंग्स सीजन पर नजर रखनी चाहिए, जहां बाजार को स्टेबल ग्रोथ और मजबूत रुपये जैसे ट्रिगर्स की तलाश होगी।
