India US Tariffs: भारत की मांग, अमेरिका से फार्मा और टेक के लिए 'टैरिफ शील्ड' मिले!

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AuthorMehul Desai|Published at:
India US Tariffs: भारत की मांग, अमेरिका से फार्मा और टेक के लिए 'टैरिफ शील्ड' मिले!

अमेरिकी टैरिफ के बढ़ते खतरे को देखते हुए, भारत के एक संसदीय पैनल ने सरकार से फार्मा (Pharmaceuticals), स्मार्टफोन और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों के लिए अमेरिका से टैरिफ छूट (tariff exemptions) हासिल करने का आग्रह किया है। यह सलाह उन संभावित अमेरिकी टैरिफ रोडमैप के जवाब में आई है, जिनके तहत 2029 तक जेनेरिक दवाओं पर ड्यूटी 200% तक बढ़ सकती है।

टैरिफ छूट की मांग

वाणिज्य पर संसदीय स्थायी समिति ने 6 अगस्त 2026 को संसद में अपनी रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में अमेरिका के साथ बातचीत कर भारत के अहम निर्यात क्षेत्रों को सुरक्षा प्रदान करने की बात कही गई है। समिति ने, जिसकी अगुआई सांसद डोला सेन कर रही थीं, विशेष रूप से सरकार को फार्मा, स्मार्टफोन और क्रिटिकल मिनरल्स पर भविष्य में लगने वाले अमेरिकी टैरिफ से पूरी छूट दिलाने का सुझाव दिया है।

फार्मा सेक्टर पर खतरा

यह सिफारिश भारतीय निर्यातकों, खासकर फार्मास्युटिकल उद्योग के लिए एक नाजुक समय पर आई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने जेनेरिक दवाओं के आयात पर टैरिफ लगाने की एक योजना बनाई है। इस प्रस्ताव के तहत, 1 अगस्त 2028 तक ड्यूटी 0% रहेगी, लेकिन उसके बाद एक साल के लिए यह 100% हो जाएगी और 1 अगस्त 2029 से यह बढ़कर 200% तक पहुंच जाएगी। अमेरिका में बिकने वाली लगभग आधी जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति भारत करता है, ऐसे में इन टैरिफ के लागू होने से भारतीय दवा निर्माताओं के एक्सपोर्ट रेवेन्यू (export revenues) और प्रॉफिट मार्जिन (profit margins) पर गंभीर असर पड़ सकता है।

ट्रेड एग्रीमेंट और वॉच डेस्क

समिति ने विदेश व्यापार महानिदेशालय (Directorate General of Foreign Trade) के तहत एक विशेष 'वॉच डेस्क' स्थापित करने की भी सलाह दी है। यह यूनिट अमेरिकी कस्टम प्रक्रियाओं (U.S. customs procedures) पर रियल-टाइम में नजर रखेगी ताकि व्यापार नीति में अचानक होने वाले बदलावों से भारतीय व्यवसायों को आगाह किया जा सके। इसका व्यापक लक्ष्य वाशिंगटन के साथ प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) को जल्द पूरा करना है, ताकि 2030 तक कुल व्यापार 500 बिलियन डॉलर तक पहुंच सके।

संभावित जोखिम और बाजार पर असर

इन संभावित टैरिफ को लेकर अनिश्चितता निवेशकों के लिए कई जोखिम पैदा करती है। पहला, ऊंची ड्यूटी का खतरा लंबी अवधि में मार्जिन पर दबाव डालेगा। भारतीय निर्यातक पहले से ही मध्य पूर्व में शिपिंग व्यवधानों के कारण बढ़े हुए फ्रेट लागत (freight costs) और ट्रांजिट समय से जूझ रहे हैं, और अतिरिक्त टैरिफ लागत उनकी लाभप्रदता को और भी कम कर सकती है।

दूसरा, व्यापार नीति को लेकर लंबे समय तक बनी रहने वाली अनिश्चितता निवेश की भावना (investment sentiment) को कमजोर कर सकती है, खासकर मूल्य वर्धित वस्तुओं (value-added goods) में शामिल छोटी कंपनियों के लिए। यदि कंपनियां अपनी भविष्य की टैक्स लागत का अनुमान नहीं लगा पाती हैं, तो वे पूंजीगत व्यय (capital spending) या क्षमता विस्तार (capacity expansion) में देरी कर सकती हैं। निवेशक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की प्रगति और अमेरिकी सरकार की ओर से इन टैरिफ प्रस्तावों पर किसी भी आधिकारिक प्रतिक्रिया पर नजर रखेंगे, क्योंकि ये आने वाले वर्षों में फार्मास्युटिकल और टेक्नोलॉजी सेक्टर के निर्यात के दृष्टिकोण को सीधे प्रभावित करेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.