देश भर के स्कूल छात्रों का गुस्सा बढ़ रहा है। टूटी-फूटी क्लासरूम और सुविधाओं की कमी जैसे गंभीर मुद्दे सामने आ रहे हैं। UDISE+ 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार, मरम्मत पर ₹20,000 करोड़ का अनुमानित खर्च सरकार के शिक्षा बजट पर भारी दबाव डाल रहा है।
छात्रों का आंदोलन, बढ़ती मांगें
भारत में छात्र-आधारित विरोध प्रदर्शनों की लहर तेज हो गई है। अगस्त 2026 के अंत तक कम से कम 10 राज्यों और 25 जिलों में ऐसे आंदोलन दर्ज किए गए हैं। छात्र, जो अपने आंदोलन को 'जेन अल्फा स्ट्रगल' कह रहे हैं, सड़कों पर उतरकर स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर में बुनियादी सुधारों की मांग कर रहे हैं। इन प्रदर्शनों में जर्जर क्लासरूम, शिक्षकों की कमी, अनियमित बिजली आपूर्ति और बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं का अभाव जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी की भूमिका
इन विरोध प्रदर्शनों की तीव्रता में युवा-नेतृत्व वाली कॉकरोच जनता पार्टी (Cockroach Janta Party) की भागीदारी ने और इजाफा किया है। इस पार्टी ने छात्र की मांगों को व्यवस्थित करने और असंतोष को सामूहिक आवाज देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह आंदोलन परीक्षाओं प्रणालियों पर राष्ट्रीय बहस की अवधि के बाद आया है, जो युवा पीढ़ी के नागरिक और शैक्षिक नीति के साथ जुड़ने के तरीके में एक संभावित बदलाव का संकेत देता है।
UDISE+ रिपोर्ट का खुलासा
17 अगस्त 2026 को जारी UDISE+ 2025-26 की रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि छात्रों द्वारा उठाए गए मुद्दे शिक्षा प्रणाली में व्यापक और लगातार अंतराल को दर्शाते हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर संकट का एक सबसे चौंकाने वाला उदाहरण हाल ही में राजस्थान में सामने आया, जहां राज्य के हाई कोर्ट ने छात्र सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 86,934 जर्जर क्लासरूम को तुरंत बंद करने का आदेश दिया। इस प्रशासनिक कार्रवाई ने चुनौती के विशाल पैमाने को उजागर किया, क्योंकि ये संरचनाएं अब उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती हैं।
₹20,000 करोड़ का वित्तीय बोझ
विशेषज्ञों का अनुमान है कि अकेले इन असुरक्षित क्लासरूम की मरम्मत या पुनर्निर्माण की लागत ₹20,000 करोड़ तक पहुंच सकती है। यह राज्य और केंद्र सरकारों के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय बाधा खड़ी करता है। सुरक्षित, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आवश्यक निवेश वर्तमान में वार्षिक शिक्षा बजट से कहीं अधिक है। जब इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च इन आवश्यकताओं के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता है, तो इसका परिणाम दीर्घकालिक आर्थिक जोखिम होता है: सरकारी स्कूलों में खराब सीखने के परिणाम और उच्च ड्रॉपआउट दर, जो भविष्य के कार्यबल की गुणवत्ता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है।
आगे की राह
आने वाले महीनों में सरकार की प्रतिक्रिया इस वित्तीय दबाव को लेकर महत्वपूर्ण होगी। जबकि राष्ट्रीय नीति का उद्देश्य मानकों में सुधार करना है, जमीनी हकीकत - सुरक्षा चिंताओं और सुविधाओं की कमी से चिह्नित - यह बताती है कि शिक्षा के लिए पूंजी आवंटन की सावधानीपूर्वक निगरानी की आवश्यकता होगी। जैसे-जैसे छात्र जवाबदेही के लिए दबाव बना रहे हैं, नीति निर्माताओं के लिए केंद्रीय चुनौती यह बनी हुई है कि आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर मरम्मत और सीमित बजट संसाधनों के बीच फंडिंग के अंतर को प्रभावी ढंग से कैसे पाटा जाए।
