भारत और सदर्न अफ्रीकन कस्टम्स यूनियन (SACU) ने एक अहम करार किया है। दोनों पक्ष एक प्रेफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट (PTA) पर बातचीत शुरू करने जा रहे हैं। इस डील का मकसद भारत के लिए जरूरी मिनरल्स (खनिज) की सप्लाई पक्की करना और ऑटो एक्सपोर्ट को बचाना है, खासकर तब जब टैरिफ (शुल्क) बढ़ने का खतरा है।
डील से भारत को क्या मिलेगा?
भारत और सदर्न अफ्रीकन कस्टम्स यूनियन (SACU) ने प्रेफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट (PTA) के लिए बातचीत का रास्ता खोल दिया है। 12 अगस्त 2026 को दोनों पक्षों ने औपचारिक बातचीत शुरू करने के लिए 'टर्म्स ऑफ रेफरेंस' पर साइन किए हैं। यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि SACU समूह, जिसमें साउथ अफ्रीका, बोत्सवाना, नामीबिया, लेसोथो और एस्वातिनी शामिल हैं, प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। भारत इन खनिजों को अपने बढ़ते मैन्युफैक्चरिंग और क्लीन एनर्जी सेक्टर के लिए हासिल करना चाहता है।
मिनरल्स और ऑटो सेक्टर पर फोकस
भारतीय निवेशकों और बिजनेसेज के लिए इस बातचीत के दो मुख्य पहलू हैं: पहला, क्रिटिकल मिनरल्स जैसे लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज, कॉपर और प्लैटिनम की भरोसेमंद सप्लाई सुनिश्चित करना, जो इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर इलेक्ट्रिक व्हीकल्स तक के लिए जरूरी हैं। दूसरा, अपने मौजूदा एक्सपोर्ट मार्केट को बचाना। SACU देश स्थानीय स्तर पर मिनरल प्रोसेसिंग में निवेश चाहते हैं। अगर भारतीय कंपनियां SACU क्षेत्र में ही प्रोसेसिंग यूनिट लगाती हैं, तो उन्हें सप्लाई चेन में स्थिरता मिल सकती है और दूसरी ग्लोबल सप्लायर्स पर निर्भरता कम हो सकती है।
ऑटो एक्सपोर्टर्स इस बातचीत पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। साउथ अफ्रीका, जो SACU की इकॉनमी का बड़ा हिस्सा है, विदेशी गाड़ियों पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने पर विचार कर रहा है। यह ड्यूटी 25% से बढ़कर 50% तक हो सकती है। भारत इस क्षेत्र में कारों और ऑटो कंपोनेंट्स का एक बड़ा एक्सपोर्टर है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में भारत का ऑटो एक्सपोर्ट इस रीजन में $1.7 बिलियन रहा था। एक सफल ट्रेड डील भारतीय ऑटो कंपनियों को इस बढ़ी हुई ड्यूटी से बचा सकती है और उन्हें अफ्रीकी मार्केट में कॉम्पिटिटिव बनाए रख सकती है।
क्या हैं चुनौतियां?
हालांकि, निवेशकों को सतर्क रहना चाहिए क्योंकि इस स्तर की बातचीत में कई मुश्किलें आ सकती हैं। सबसे बड़ी चुनौती इसका पिछला रिकॉर्ड है। 2002 से 2010 के बीच भारत और SACU के बीच ऐसे ही ट्रेड एग्रीमेंट की कोशिशें नाकाम रही थीं। इसके अलावा, भारत जहां अपने सामानों पर कम टैरिफ चाहता है, वहीं उसे अपने घरेलू मार्केट को SACU देशों के लिए खोलना पड़ सकता है। इससे कुछ लोकल इंडस्ट्रीज को चिंता हो सकती है।
कुल मिलाकर, फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में भारत का SACU के साथ ट्रेड $7.5 बिलियन का एक्सपोर्ट (मुख्यतः पेट्रोलियम, ऑटो, फार्मा) और $9.2 बिलियन का इंपोर्ट (मुख्यतः गोल्ड, कोल, मिनरल्स) रहा। यह देखना अहम होगा कि क्या फाइनल डील भारत की इंडस्ट्रियल इनपुट्स की जरूरत और SACU देशों की लोकल जॉब क्रिएशन और मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ की इच्छा के बीच संतुलन बना पाती है।
