भारत और रूस ने साल 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को **$100 अरब** तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, अमेरिका के प्रस्तावित 'Sanctioning Russia and Iran Act of 2026' के तहत लगने वाले संभावित टैरिफ इस योजना के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
ट्रेड इंबैलेंस और एनर्जी पर निर्भरता
भारत और रूस के बीच आर्थिक साझेदारी का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। दोनों देशों ने $100 अरब के एनुअल ट्रेड और $50 अरब के निवेश का लक्ष्य तय किया है। फिलहाल, दोनों देशों का व्यापार लगभग $70 अरब तक पहुंच चुका है, लेकिन इसमें सबसे बड़ी दिक्कत 'एनर्जी डिपेंडेंसी' है। भारत के रूस से होने वाले कुल आयात में करीब 80% हिस्सेदारी सिर्फ क्रूड ऑयल की है, जिससे ट्रेड डेफिसिट का आंकड़ा $55 अरब को पार कर गया है।
भारत सरकार अब इस निर्भरता को कम करने के लिए फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग गुड्स और क्रिटिकल मिनरल्स के निर्यात को बढ़ावा दे रही है, ताकि आर्थिक रिश्ते अधिक संतुलित बन सकें।
अमेरिकी कानून का खतरा
मार्केट के लिए सबसे बड़ा रिस्क अमेरिका से आ रहा है। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 'Sanctioning Russia and Iran Act of 2026' पर विचार किया जा रहा है। अगर यह कानून पास होता है, तो रूसी एनर्जी खरीदने वाले देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाया जा सकता है।
हालांकि यह अभी एक विधायी प्रक्रिया है, लेकिन इसमें भारत और चीन का नाम आने से वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता का माहौल है। यदि यह कानून लागू हुआ, तो भारत के लिए सस्ता क्रूड ऑयल खरीदना मुश्किल हो सकता है, जिसका सीधा असर भारतीय रिफाइनर्स, रुपये की चाल और घरेलू महंगाई पर पड़ सकता है।
डिफेंस और टेक्नोलॉजी पर फोकस
ऊर्जा से आगे बढ़ते हुए, भारत अब डिफेंस और हेवी इंजीनियरिंग में रूस के साथ मिलकर लोकल मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर जोर दे रहा है। निवेशक अभी सतर्क हैं क्योंकि सरकार को एक तरफ अपनी एनर्जी सिक्योरिटी बचानी है, तो दूसरी तरफ 'जियोपॉलिटिकल टाइट्रोप' (भू-राजनीतिक संतुलन) को भी बरकरार रखना है। आने वाले समय में गैर-ऊर्जा क्षेत्र में ट्रेड की प्रगति और अमेरिकी कानूनों का अंतिम स्वरूप ही तय करेगा कि यह साझेदारी कितनी सुरक्षित है।
