भारत में सड़क निर्माण की गति पर ब्रेक लगता दिख रहा है। FY27 तक यह घटकर **21 किमी प्रति दिन** रह सकती है, जो FY26 में **25 किमी प्रति दिन** थी। नई परियोजनाओं में कमी और जमीन अधिग्रहण जैसी चुनौतियां इस सुस्ती की मुख्य वजह हैं, जिसका असर इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों पर पड़ना तय है।
सड़क निर्माण के क्षेत्र में अब एक 'कूलिंग फेस' शुरू हो चुका है। साल FY21 में जब देश में 36.8 किमी प्रति दिन की रिकॉर्ड रफ्तार से सड़कें बन रही थीं, वहीं अब यह गति कम होकर FY27 तक लगभग 21 किमी प्रति दिन पर आने का अनुमान है।
नई परियोजनाओं में कमी से चुनौती
इस सुस्ती के पीछे सबसे बड़ा कारण नए प्रोजेक्ट्स के कॉन्ट्रैक्ट्स का कम होना है। CareEdge Ratings की रिपोर्ट के मुताबिक, FY22 में हाईवे कॉन्ट्रैक्ट अवार्ड्स 12,731 किमी के हाई लेवल पर थे, जो अब FY26 तक गिरकर 7,000 किमी के आसपास सिमटने की उम्मीद है। सरकारी प्रोजेक्ट्स की संख्या कम होने से इंफ्रा कंपनियों के ऑर्डर बुक पर दबाव देखने को मिल सकता है।
इंफ्रा कंपनियों पर क्या होगा असर?
NHAI (National Highways Authority of India) पर निर्भर रहने वाली कंस्ट्रक्शन कंपनियों के लिए अब दौर बदलने वाला है। जिन कंपनियों के पास राज्यों के प्रोजेक्ट्स (State-level projects) और मजबूत ऑर्डर बुक है, वे इस दौर में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। अब सेक्टर का फोकस 'एसेट क्रिएशन' से हटकर 'ऑपरेशनल एफिशिएंसी' और एसेट मोनेटाइजेशन, जैसे कि TOT (Toll-Operate-Transfer) मॉडल और InvITs की तरफ बढ़ रहा है।
रिस्क और चुनौतियां
ऑर्डर मिलने की रफ्तार कम होने के साथ-साथ जमीन अधिग्रहण (Land acquisition) और सरकारी मंजूरियों जैसी पुरानी बाधाएं अभी भी बरकरार हैं। यदि काम पूरा करने में देरी होती है, तो लागत बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर कंपनियों के मार्जिन पर पड़ेगा। आने वाले समय में निवेशकों को कंपनियों के क्वार्टरली रिजल्ट्स और कर्ज कम करने के लिए एसेट सेल्स पर बारीक नजर रखनी होगी।
