भारत अपनी मॉडल बाइलateral इन्वेस्टमेंट ट्रीटी (BIT) में बड़े बदलाव करने जा रहा है। इस कदम का मकसद विदेशी निवेशकों की चिंताओं को दूर करना और देश में फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) को बढ़ाना है। सरकार इस प्रस्ताव को जल्द ही कैबिनेट में पेश करेगी।
क्यों हो रहा है बदलाव?
भारत सरकार साल 2016 की मॉडल बाइलateral इन्वेस्टमेंट ट्रीटी (BIT) की समीक्षा कर रही है। यह ट्रीटी तय करती है कि विदेशी निवेश को कैसे सुरक्षित रखा जाए और उसका प्रबंधन कैसे हो। इकोनॉमिक अफेयर्स सेक्रेटरी Anuradha Thakur ने 7 अगस्त, 2026 को बताया कि इस समीक्षा का काम चल रहा है और प्रस्ताव जल्द ही कैबिनेट के सामने मंजूरी के लिए जाएगा।
निवेशकों के लिए यह क्यों ज़रूरी है?
एक बाइलateral इन्वेस्टमेंट ट्रीटी (BIT) दो देशों के बीच एक समझौता होता है जो निवेश के लिए एक कानूनी ढांचा तैयार करता है। मौजूदा मॉडल पर यूके (UK) और सऊदी अरब (Saudi Arabia) जैसे कई देशों ने भी अत्यधिक प्रतिबंधात्मक होने की आलोचना की है। एक बड़ा मुद्दा यह है कि विदेशी निवेशकों को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता (international arbitration) के लिए जाने से पहले 5 साल तक घरेलू कानूनी उपायों को खत्म करना होगा। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का कहना है कि इतनी लंबी अवधि अनिश्चितता पैदा करती है और देश में पैसा लगाने से रोकती है।
इन क्लॉज़ (clauses) को बदलकर, सरकार इन चिंताओं को दूर करना चाहती है और विदेशी निवेशकों के लिए एक अधिक अनुमानित माहौल बनाना चाहती है। यह पहल फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) को बढ़ावा देने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है, जिसने FY26 में लगभग $7.65 बिलियन का नेट इनफ्लो दर्ज किया था।
FDI और बाहरी निवेश के बीच संतुलन
जहां यह समीक्षा अधिक विदेशी पूंजी को आकर्षित करने पर केंद्रित है, वहीं सरकार भारत की वैश्विक निवेशक के रूप में बढ़ती स्थिति पर भी विचार कर रही है। जैसे-जैसे भारतीय कंपनियां विदेशों में अपने संचालन का विस्तार कर रही हैं, उन्हें भी दूसरे देशों में सुरक्षा की आवश्यकता होगी। इसलिए, संशोधित मॉडल को दो-तरफा होना चाहिए: इसे विदेशी निवेशकों को सहज महसूस कराने के लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए, और साथ ही भारतीय कंपनियों को विदेश में निवेश करते समय पर्याप्त सुरक्षा मिलनी चाहिए।
संप्रभु अधिकारों की चुनौती
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती एक निवेशक-अनुकूल माहौल बनाने और अपनी नीति-निर्माण शक्ति को बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना है। इन्वेस्टर-स्टेट आर्बिट्रेशन (Investor-state arbitration) कंपनियों को सरकारों पर मुकदमा करने की अनुमति देता है, जिससे राज्य पर भारी वित्तीय देनदारियां आ सकती हैं। सरकार का लक्ष्य मध्यस्थता प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना है, ताकि देश को अत्यधिक या महंगे कानूनी दावों का सामना न करना पड़े जो उसकी नीतिगत लचीलेपन को प्रभावित कर सकते हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
अगला महत्वपूर्ण अपडेट कैबिनेट चर्चा का परिणाम और मॉडल ट्रीटी में किए गए विशिष्ट संशोधनों का होगा। मध्यस्थता क्लॉज़ (arbitration clauses) या घरेलू कानूनी उपायों की समय-सीमा में कोई भी बदलाव अंतरराष्ट्रीय व्यवसायों और कानूनी विशेषज्ञों द्वारा बारीकी से देखा जाएगा। ये समायोजन भारत की निवेश जलवायु को आधुनिक बनाने की प्रतिबद्धता का एक प्रमुख संकेतक होंगे, ताकि वह अन्य प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ पूंजी के लिए प्रतिस्पर्धा कर सके।
