सरकार अपने दो प्रमुख एक्सपोर्ट रिफंड प्रोग्राम्स RoDTEP और RoSCTL में बड़ा बदलाव करने जा रही है। अगले **5** सालों के लिए **₹2 लाख करोड़** की फंडिंग डिमांड के बाद अब इन स्कीम्स को और अधिक प्रभावी बनाया जाएगा, जिसका सीधा असर एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड कंपनियों के मार्जिन पर पड़ेगा।
केंद्र सरकार ने अपने दो महत्वपूर्ण एक्सपोर्ट सपोर्ट प्रोग्राम्स—Remission of Duties and Taxes on Exported Products (RoDTEP) और Rebate of State and Central Taxes and Levies (RoSCTL)—की समीक्षा शुरू कर दी है। वाणिज्य मंत्रालय और कपड़ा मंत्रालय के अधिकारियों के नेतृत्व में गठित दो विशेष समितियां इस बात का आकलन कर रही हैं कि इन रिफंड मैकेनिज्म को और अधिक सटीक कैसे बनाया जाए। यह कदम तब उठाया गया है जब सरकार राजकोषीय नियंत्रण (fiscal control) को सख्त करना चाहती है, क्योंकि उसे अगले 5 वर्षों के लिए लगभग ₹2 लाख करोड़ के फंडिंग प्रस्ताव मिले हैं।
कंपनियों के लिए क्यों है यह अहम?
ये प्रोग्राम्स भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये उन टैक्स और लेवी की भरपाई करते हैं, जो GST के दायरे में नहीं आते। इनमें बिजली, ईंधन और स्टैम्प ड्यूटी जैसे खर्चे शामिल हैं। रिफंड के जरिए सरकार यह सुनिश्चित करती है कि भारतीय सामान ग्लोबल मार्केट में प्रतिस्पर्धी बने रहें। नई पहल के तहत सरकार अब फ्लैट-रेट रिफंड के बजाय डेटा-आधारित अप्रोच अपनाने पर विचार कर रही है ताकि उत्पादन की वास्तविक लागत को रिफंड में बेहतर तरीके से शामिल किया जा सके।
निवेशकों पर क्या होगा असर?
निवेशकों के लिए यह खबर काफी अहम है, खासकर टेक्सटाइल, केमिकल और इंजीनियरिंग सेक्टर से जुड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए। यदि नई पॉलिसी के तहत रिफंड रेट्स में कटौती होती है, तो कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, यदि यह बदलाव लागत के साथ बेहतर तालमेल बिठाता है, तो कमजोर ग्लोबल डिमांड से जूझ रहे सेक्टरों को बड़ी राहत मिल सकती है।
डेडलाइन पर नजर
इन स्कीम्स के लिए मौजूदा विस्तार (extension) इस साल दिसंबर के अंत में समाप्त हो रहा है। समितियों की सिफारिशें ही मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए सरकार के अगले सपोर्ट प्लान का आधार बनेंगी। बाजार की निगाहें अब फाइनल नोटिफिकेशन पर टिकी हैं, जिससे यह साफ होगा कि एक्सपोर्ट-हेवी कंपनियों को मिलने वाली सरकारी मदद का स्वरूप आगे क्या होगा।
