भारत का फूड रिटेल सेक्टर अब ट्रेडिशनल सप्लाई चेन को बदल रहा है। कंपनियां मुनाफे में सुधार और खाने की बर्बादी को कम करने के लिए अब सीधे किसानों से खरीदारी (Direct Sourcing) पर जोर दे रही हैं।
भारत के फूड सप्लाई चेन में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। संगठित रिटेल चेन अब पुरानी और जटिल 'मिडलमैन' वाली खरीद प्रक्रिया से दूर हो रही हैं। पारंपरिक तरीके से खेत से दुकान तक पहुंचने में फल और सब्जियां काफी खराब हो जाती थीं, जिससे न सिर्फ बर्बादी होती थी बल्कि किसानों को भी सही दाम नहीं मिल पाता था। अब बड़ी कंपनियां सीधे किसानों या 'फार्म-गेट' कलेक्शन सेंटर्स से माल उठा रही हैं।
मुनाफे के लिए ये बदलाव जरूरी
ग्रोसरी बिजनेस में खराब होने वाले सामान (perishables) का वेस्टेज मुनाफे के लिए सबसे बड़ा खतरा है। कंपनियां अब 'डेटा-ड्रिवन डिमांड फोरकास्टिंग' का सहारा ले रही हैं ताकि यह सटीक पता चल सके कि बाजार में कितनी मांग है। इससे इन्वेंट्री मैनेजमेंट बेहतर हो रहा है और बर्बादी कम हो रही है, जो सीधे तौर पर कंपनी के नेट प्रॉफिट मार्जिन को सपोर्ट करेगा।
इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश की चुनौती
इस बदलाव की नींव कोल्ड-चेन लॉजिस्टिक्स है। रेफ्रिजरेटेड ट्रक और आधुनिक स्टोरेज सुविधाओं में कंपनियां भारी पूंजी लगा रही हैं। हालांकि, यह निवेश बिजनेस के लिए जरूरी है, लेकिन यह काफी 'कैपिटल-इंटेंसिव' है। कंपनियों के सामने चुनौती यह है कि वे अपने विस्तार और कैश फ्लो को कैसे बैलेंस करती हैं। अगर इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च के मुकाबले सेल्स नहीं बढ़ी, तो शॉर्ट-टर्म में फाइनेंशियल परफॉर्मेंस पर दबाव दिख सकता है।
क्विक-कॉमर्स का दबाव
क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती रफ्तार ने भी बाजार में होड़ बढ़ा दी है। अब ट्रेडिशनल रिटेलर्स को न केवल अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करना है, बल्कि स्पीड के मामले में भी खुद को अपडेट रखना है। निवेशकों के लिए 'इन्वेंट्री टर्नओवर रेशियो' और 'लॉजिस्टिक्स लागत' जैसे पैरामीटर्स पर नजर रखना जरूरी होगा। यदि कोई कंपनी बिना कर्ज बढ़ाए वेस्टेज को कम कर लेती है, तो वह लंबी अवधि में मार्केट में अपनी धाक जमा सकती है।
