देश के प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर गिरकर **67%** पर आ गया है, जो पिछले साल और **10** साल के औसत से काफी कम है। दक्षिण भारत में स्थिति नाजुक है, जिसका सीधा असर आने वाली रबी फसल और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है।
सेंट्रल वाटर कमीशन के ताजा डेटा के मुताबिक, भारत के प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर घटकर 67% रह गया है। यह आंकड़ा 10 साल के औसत से 18.5% और पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 26.5% कम है। यह गिरावट न केवल कृषि, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए एक चिंता का विषय है।
दक्षिण भारत में सबसे गंभीर हालात
सबसे ज्यादा असर दक्षिण भारत में दिख रहा है, जहां जलाशयों में पानी का स्तर सिर्फ 42% बचा है। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में कई बड़े बांध अपनी क्षमता के एक-तिहाई से भी कम पर चल रहे हैं। पानी की यह कमी रबी फसल की बुवाई को सीधे प्रभावित कर सकती है। रबी सीजन के लिए पानी की कमी से फसलों की पैदावार कम हो सकती है, जिसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और वहां काम करने वाली एफएमसीजी (FMCG) कंपनियों की मांग पर पड़ेगा।
पावर सेक्टर और महंगाई पर असर
पानी की कमी का असर बिजली उत्पादन पर भी पड़ रहा है। जलाशयों में पानी कम होने से हाइड्रोपावर जनरेशन (Hydropower Generation) सुस्त हो सकता है, जिससे पावर कंपनियों को थर्मल एनर्जी यानी कोयले पर निर्भरता बढ़ानी पड़ सकती है। अगर ऐसा होता है, तो कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
साथ ही, अगर फसलों की पैदावार प्रभावित होती है, तो खाद्य महंगाई (Food Inflation) में उछाल आ सकता है। यह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए एक अहम मुद्दा है, क्योंकि महंगाई का सीधा असर भविष्य की ब्याज दरों (Interest Rates) पर पड़ता है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
देश के 75% जिलों में बारिश की कमी पहले से ही दर्ज की गई है। आने वाले समय में रबी फसल की बुवाई की रिपोर्ट और ग्रामीण इलाकों से आने वाली कॉर्पोरेट कमेंट्री पर निवेशकों को पैनी नजर रखनी होगी। कंपनियों के लिए चुनौती यह होगी कि वे बढ़ती इनपुट कॉस्ट को कैसे मैनेज करती हैं और क्या इसका असर उनके मार्जिन पर पड़ता है या नहीं।
