सरकार अब 2016 के पुराने Bilateral Investment Treaty (BIT) फ्रेमवर्क को बदल रही है। इस नए और इन्वेस्टर-फ्रेंडली टेम्पलेट का मकसद आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया को सरल बनाना और विदेशी निवेश को रफ्तार देना है, जो 2026 की पहली छमाही में सुस्त नजर आया था।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पुष्टि की है कि नया ड्राफ्ट कैबिनेट की मंजूरी के लिए तैयार है। 2016 का मौजूदा फ्रेमवर्क अक्सर मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए विवाद की वजह बन जाता था, जिसे अब सरकार पूरी तरह बदलने की तैयारी में है।
क्या थी समस्या और क्या बदलेगा?
पुराने मॉडल में 'एक्सॉर्शन ऑफ लोकल रेमेडीज' (exhaustion of local remedies) की एक सख्त शर्त थी। इसके तहत विदेशी कंपनियों को किसी विवाद को इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन में ले जाने से पहले भारत की लोकल अदालतों में 5 साल तक इंतजार करना पड़ता था। निवेशकों के लिए यह लंबा कानूनी सफर और अनिश्चितता का बड़ा कारण था। नए टेम्पलेट में इसे काफी लचीला बनाया जा रहा है ताकि विवादों का निपटारा जल्द हो सके।
सरकार की रणनीति और लक्ष्य
भारत सरकार पहले ही UAE, ओमान, उज्बेकिस्तान और इजरायल जैसे देशों के साथ अधिक लचीले समझौते कर चुकी है। अब सरकार का लक्ष्य साल 2026 के अंत तक कम से कम 3 और बड़े निवेश समझौते करने का है, जिसके लिए कनाडा और रूस जैसे देशों के साथ चर्चा चल रही है।
FDI पर नजर
यह कदम 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के लिहाज से तो सकारात्मक है, लेकिन बाजार के जानकारों का कहना है कि यह इकॉनमी का एकमात्र समाधान नहीं है। साल 2026 की पहली छमाही में भारत में लगभग $12 बिलियन का FDI आया था। निवेश का असली फ्लो तो घरेलू ग्रोथ, सेक्टर-स्पेशिफिक डिमांड और ग्लोबल कैपिटल की उपलब्धता पर निर्भर करेगा। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि कैबिनेट की मंजूरी के बाद यह नया फ्रेमवर्क जमीन पर किस तरह से लागू होता है।
