भारत सरकार FY27 के लिए **4.3%** के फिस्कल डेफिसिट लक्ष्य को पूरा करने की ओर सही दिशा में बढ़ रही है। चालू फाइनेंशियल ईयर के पहले छह महीनों में डेफिसिट पूरे साल के अनुमान का **42.1%** रहा है। कॉर्पोरेट टैक्स से मिल रही जबरदस्त कमाई सरकारी खजाने के लिए सहारा बनी हुई है, हालांकि ग्लोबल एनर्जी प्राइसेज में उतार-चढ़ाव एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
सरकारी खजाने का हाल
कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट्स (CGA) के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच फिस्कल डेफिसिट ₹7.14 लाख करोड़ दर्ज किया गया है। यह आंकड़ा साल भर के लक्ष्य का 42.1% है, जो बताता है कि सरकार का खर्च और कमाई का गणित फिलहाल ट्रैक पर है।
कॉर्पोरेट टैक्स बना 'गेम चेंजर'
इस परफॉर्मेंस के पीछे सबसे बड़ा कारण कॉर्पोरेट टैक्स में हुई शानदार बढ़ोतरी है। पिछले साल के मुकाबले इसमें करीब 22% का उछाल देखने को मिला है। यह सरकारी रेवेन्यू के लिए एक बड़ा बफर साबित हुआ है, जिसने दूसरी तरफ के उतार-चढ़ाव को संभालने में मदद की है।
चुनौतियों का साया
सरकार के सामने सबसे बड़ी बाधा ग्लोबल कमोडिटी मार्केट से आ रही है। यदि एनर्जी की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो सरकार के सामने दो तरह का दबाव बन सकता है:
- फर्टिलाइजर सब्सिडी का खर्च बढ़ सकता है।
- जनता को राहत देने के लिए फ्यूल एक्साइज ड्यूटी कम करने का दबाव बढ़ सकता है, जिससे रेवेन्यू घट सकता है।
सरकार की रणनीति
इन जोखिमों से निपटने के लिए सरकार 'एक्सपेंडिचर रिप्रायोरिटाइजेशन' (Expenditure Reprioritization) पर जोर दे रही है। यानी गैर-जरूरी खर्चों को कम करके इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अहम कैपिटल इन्वेस्टमेंट को सुरक्षित रखा जा रहा है। Goldman Sachs के एनालिस्ट्स का भी मानना है कि फिस्कल डिसिप्लिन बनाए रखने के लिए यह कदम बेहद जरूरी है। निवेशकों के लिए आने वाले महीनों में एनर्जी की कीमतें और सरकारी सब्सिडी के आंकड़ों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
