भारत ने BRICS देशों के लिए एक साझा मुद्रा (Common Currency) बनाने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। इसके बजाय, भारत ने डिजिटल पेमेंट सिस्टम और CBDC को जोड़ने पर जोर दिया है, ताकि ग्लोबल ट्रेड में डॉलर पर निर्भरता कम हो और लागत में कमी आए।
डिजिटल पेमेंट का नया दौर
नई दिल्ली में आयोजित होने वाले 18वें BRICS समिट से पहले भारत सरकार ने अपनी मॉनेटरी पॉलिसी का रुख स्पष्ट कर दिया है। साझा मुद्रा के बजाय भारत अब सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) और भारत के यूपीआई (UPI) जैसे फास्ट पेमेंट सिस्टम को इंटरकनेक्ट करने की वकालत कर रहा है।
RBI का मास्टर प्लान
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) इस पहल का नेतृत्व कर रहा है, जिसका लक्ष्य स्थानीय मुद्राओं में व्यापार (Trade Settlement) को आसान बनाना है। इससे न केवल लेनदेन की गति बढ़ेगी, बल्कि डॉलर पर आधारित ट्रेडिशनल बैंकिंग नेटवर्क की भारी लागत से भी निजात मिलेगी। भारत का यह कदम अपनी स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी बनाए रखने के लिए बेहद अहम है, जिससे चीन की करेंसी 'रेन्मिन्बी' पर निर्भर होने का जोखिम भी टल जाएगा।
इकोनॉमिक चुनौतियां और रिस्क
डिजिटल पेमेंट सिस्टम व्यापार को सुगम तो बना सकता है, लेकिन यह मैक्रो-इकोनॉमिक चुनौतियों को पूरी तरह खत्म नहीं करता। भारत का ट्रेड डेफिसिट और तेल आयात पर निर्भरता आज भी रुपये की चाल के लिए मुख्य रिस्क फैक्टर बने हुए हैं। मार्केट एनालिस्ट्स के मुताबिक, साल 2026 की दूसरी छमाही में USD/INR का दायरा 93 से 98 के बीच देखा गया है।
आगे की राह
इस प्रोजेक्ट की सफलता सुरक्षा प्रोटोकॉल और फ्रॉड मैनेजमेंट पर निर्भर करेगी। निवेशकों को आगामी समिट में आने वाली घोषणाओं और पायलट प्रोग्राम की टाइमलाइन पर नजर रखनी चाहिए, जो यह तय करेंगे कि यह तकनीक वास्तव में ट्रेड कॉस्ट को कितना कम कर पाती है।
