वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ कर दिया है कि रूस से तेल आयात को लेकर अमेरिकी कानून के दबाव में भारत अपनी नीति नहीं बदलेगा। भारत का मुख्य लक्ष्य देश में तेल की कीमतों को स्थिर रखना और रिफाइनरी ऑपरेशन्स को सुचारू बनाए रखना है।
एनर्जी सिक्योरिटी पर स्टैंड साफ
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उन चिंताओं को खारिज कर दिया है जिनमें अमेरिकी कानून के तहत रूस से एनर्जी इंपोर्ट पर 100% तक टैरिफ लगाने की बात कही गई है। सरकार के लिए प्राथमिकता 1.4 अरब नागरिकों को सस्ता और स्थिर क्रूड ऑयल उपलब्ध कराना है। यह नीतिगत रुख भारत की उस कोशिश को दर्शाता है, जिसमें वह अपनी इकोनॉमी को अचानक आने वाले ग्लोबल झटकों से बचाना चाहता है।
रिफाइनरीज के लिए क्यों है यह जरूरी?
भारत की रिफाइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर मुख्य रूप से 'मीडियम-डेंसिटी, सावर क्रूड' को प्रोसेस करने के लिए बनाई गई है। अगर भारत दूसरे सप्लायर्स पर शिफ्ट होता है, तो न केवल रिफाइनरी को अपग्रेड करने में भारी खर्च आएगा, बल्कि ऑपरेशन्स की एफिशिएंसी भी कम हो जाएगी। वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया है कि सप्लायर्स बदलने से देश में फ्यूल की कीमतें बढ़ सकती हैं और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।
इकोनॉमी और रिफाइनिंग मार्जिन पर असर
भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा क्रूड ऑयल आयात करता है। ऐसे में क्रूड की कीमतों में स्थिरता ट्रेड डेफिसिट को कंट्रोल में रखने के लिए बेहद जरूरी है। तेल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए इनपुट कॉस्ट की भविष्यवाणी करना बहुत अहम है, क्योंकि इसी पर उनका ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन निर्भर करता है।
निवेशकों के लिए आगे की राह
हालांकि ग्लोबल लेवल पर भू-राजनीतिक तनाव बना हुआ है, लेकिन सरकार भारत के मैक्रोइकॉनॉमिक आउटलुक को लेकर आश्वस्त है। बजट में ऐसे प्रावधान किए गए हैं जो कमोडिटी की बदलती कीमतों को संभालने में मदद करेंगे। अब बाजार की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टैरिफ को लेकर क्या रुख अपनाया जाता है और इसका क्रूड की उपलब्धता पर क्या असर पड़ता है।
