AI Readiness: दुनिया के टॉप 10 देशों में शामिल हुआ भारत, निवेश का बढ़ा जोश और खतरे भी

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
AI Readiness: दुनिया के टॉप 10 देशों में शामिल हुआ भारत, निवेश का बढ़ा जोश और खतरे भी

World Bank की AI रेडिनेस असेसमेंट में भारत ने टॉप 10 देशों में जगह बना ली है। साल 2025 में AI सेक्टर में प्राइवेट निवेश बढ़कर **$4.1 बिलियन** के स्तर पर पहुंच गया है। जहां यह डिजिटल क्षमता को दर्शाता है, वहीं निवेशकों को साइबर खतरों और लेबर मार्केट में अनिश्चितता जैसे जोखिमों पर भी नजर रखनी होगी।

निवेश और क्षमता में जोरदार बढ़ोतरी

भारत की इस उपलब्धि के पीछे का गणित सीधे तौर पर फाइनेंशियल डेटा में दिख रहा है। साल 2024 में जहां AI सेक्टर में $1.2 बिलियन का निवेश हुआ था, वहीं 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर $4.1 बिलियन हो गया है। इसके अलावा, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) में रोजगार का आंकड़ा 1.9 मिलियन से बढ़कर 2.36 मिलियन पहुंच गया है, जो साबित करता है कि भारतीय टैलेंट का इस्तेमाल मशीन लर्निंग और ऑटोमेशन के लिए तेजी से हो रहा है।

इतना ही नहीं, डेटा सेंटर सेक्टर में भी भारी निवेश हो रहा है। साल 2021 से अब तक इस सेक्टर में करीब $173 बिलियन की कमिटमेंट्स मिली हैं। उम्मीद है कि साल 2026 के अंत तक भारत की क्षमता 2 गीगावाट तक पहुंच जाएगी, जो AI वर्कलोड को संभालने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा है।

आर्थिक और रेगुलेटरी चुनौतियां

विकास की रफ्तार के बीच कुछ बड़े जोखिम भी हैं। World Bank ने संकेत दिए हैं कि लॉन्ग-टर्म में लेबर मार्केट पर इसका असर अनिश्चित हो सकता है, जिससे नौकरियों के स्वरूप में बदलाव का डर बना हुआ है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने भी चेतावनी दी है कि AI के बढ़ते इस्तेमाल से साइबर रिस्क बढ़ रहे हैं, जो फाइनेंशियल स्टेबिलिटी के लिए खतरा हैं। निवेशकों को यह समझना होगा कि कंपनियां सुरक्षा पर खर्च बढ़ाएंगी, जिसका असर शॉर्ट-टर्म में उनके प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ सकता है।

साथ ही, बढ़ते ग्लोबल बॉन्ड यील्ड के कारण पूंजी की लागत महंगी हो गई है, जिससे बड़े प्रोजेक्ट्स को फाइनेंस करना कठिन हो रहा है। इसके अलावा, डेटा क्वालिटी और पुरानी इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ नए सिस्टम को जोड़ना भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

निवेशकों के लिए क्या है खास?

टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र पर नजर रखने वाले निवेशकों को अब रेगुलेटरी फ्रेमवर्क पर ध्यान देना चाहिए। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इनोवेशन और डेटा सिक्योरिटी के बीच कैसे संतुलन बिठाती है। कंपनियों के मैनेजमेंट की ओर से साइबर सिक्योरिटी पर होने वाले खर्च और वर्कफोर्स के एडॉप्शन पर आने वाली कमेंट्री आगे की चाल तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.