भारत का रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर कुल खर्च 2023-24 में **₹2.45 लाख करोड़** तक पहुंच गया है। खास बात यह है कि अब प्राइवेट सेक्टर का निवेश सरकारी फंडिग से आगे निकल गया है। हालांकि, GDP के मुकाबले R&D की हिस्सेदारी अभी भी **1%** से कम है, जो अमेरिका और चीन जैसे देशों से काफी पीछे है।
R&D में आया बड़ा बदलाव!
भारत में रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) के क्षेत्र में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव आया है। 2023-24 में R&D पर कुल खर्च (GERD) बढ़कर ₹2.45 लाख करोड़ हो गया है, जो पिछले साल के ₹2.13 लाख करोड़ से ज्यादा है। अनुमान है कि 2025-26 तक यह आंकड़ा करीब ₹3.13 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।
सबसे खास बात यह है कि खर्च का तरीका भी बदला है। पहली बार, प्राइवेट सेक्टर का रिसर्च में निवेश सरकारी फंडिग से आगे निकल गया है। प्राइवेट सेक्टर ने ₹1.27 लाख करोड़ खर्च किए, जबकि पब्लिक सेक्टर का आंकड़ा ₹1.18 लाख करोड़ रहा।
GDP के मुकाबले R&D की हिस्सेदारी
हालांकि, खर्च की कुल राशि में बढ़ोतरी दिख रही है, लेकिन देश की GDP के मुकाबले R&D पर होने वाले खर्च की हिस्सेदारी (R&D intensity) चिंता का विषय बनी हुई है। 2023-24 में यह अनुपात पिछले साल के 0.82% से मामूली बढ़कर 0.84% रहा। यह दर दक्षिण कोरिया, अमेरिका और चीन जैसे प्रमुख देशों की तुलना में काफी कम है, जहां R&D इंटेंसिटी 2.5% से 4.5% तक है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
यह डेटा निवेशकों के लिए दो अहम बातें बताता है। पहला, प्राइवेट सेक्टर के बढ़ते निवेश से साफ है कि कंपनियां कॉम्पिटिशन में बने रहने के लिए इनोवेशन पर जोर दे रही हैं, खासकर टेक्नोलॉजी, फार्मा और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स में। यह दिखाता है कि कंपनियां अब रिसर्च को सिर्फ एक खर्च के तौर पर नहीं, बल्कि भविष्य की ग्रोथ और मार्केट शेयर बढ़ाने वाले जरिया के तौर पर देख रही हैं।
हालांकि, सरकारी खर्च पर निर्भरता अभी भी ज्यादा है। पब्लिक फंडिग का लगभग 76% हिस्सा सिर्फ 12 केंद्रीय साइंटिफिक एजेंसियों से आता है। इसमें डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO), अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्र प्रमुख हैं।
चुनौतियां और सरकारी पहल
प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी बढ़ने के बावजूद, देश को अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें जटिल रेगुलेटरी माहौल, एडमिनिस्ट्रेटिव देरी और रिसर्च का भौगोलिक रूप से सीमित होना शामिल है। इसके अलावा, यह भी जोखिम है कि कंपनियों पर शॉर्ट-टर्म फाइनेंशियल दबाव के कारण वे लंबे समय में फायदा देने वाले प्रोजेक्ट्स में निवेश कम कर सकती हैं।
इन कमियों को दूर करने और लंबे समय तक चलने वाले इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने 'अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन' और ₹1 लाख करोड़ का 'रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन (RDI) फंड' जैसी पहलें शुरू की हैं।
भविष्य में, इस खर्च की असलियत इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या इससे प्रोडक्टिविटी बढ़ती है और कोई बड़ी टेक्नोलॉजिकल सफलता मिलती है। सेमीकंडक्टर या एडवांस मैन्युफैक्चरिंग जैसे रिसर्च-इंटेंसिव सेक्टर्स के निवेशकों को तात्कालिक प्रॉफिट के अलावा यह देखना होगा कि कंपनियां अपनी रिसर्च पहलों को कितनी सफलतापूर्वक कमर्शियल सफलता में बदल रही हैं।
