भारत की अर्थव्यवस्था ने Q1 FY27 में **7.8%** की दमदार ग्रोथ दर्ज की है और विदेशी मुद्रा भंडार **$740.8 बिलियन** के रिकॉर्ड स्तर पर है। हालांकि, महंगाई का तड़का आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा है, क्योंकि अगस्त में फूड इन्फ्लेशन **6.03%** तक पहुंचने का अनुमान है, जो FMCG कंपनियों के मार्जिन पर दबाव डाल रहा है।
भारत की अर्थव्यवस्था ने फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए 7.8% की रियल GDP ग्रोथ हासिल की है। इस मजबूती के पीछे देश का रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार है, जो अगस्त के अंत तक $740.8 बिलियन के ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गया है। लेकिन आंकड़ों की इस चमक के बीच एक कड़वा सच यह है कि आम भारतीय परिवार महंगाई की मार झेल रहे हैं।
रसोई पर महंगाई की मार
अगस्त में फूड इन्फ्लेशन 6.03% तक पहुंचने का अनुमान है, जिसके चलते हेडलाइन रिटेल इन्फ्लेशन 4.88% रह सकती है। खाने-पीने की चीजों के दाम बेकाबू हो रहे हैं: चीनी के भाव में 19% का उछाल आया है, जबकि जुलाई में खाने के तेल की महंगाई दर 7.84% रही। खराब मौसम के कारण प्याज की कीमतों में साल-दर-साल 43% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इस स्थिति ने एफएमसीजी (FMCG) सेक्टर के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। कंपनियां पाम, सोया और सरसों के तेल जैसी कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से जूझ रही हैं। अपने मुनाफे (Margins) को बचाने के लिए कंपनियां अब 'श्रिंकफ्लेशन' (Shrinkflation) का सहारा ले रही हैं, यानी कीमत वही रखते हुए पैकेट की मात्रा कम कर रही हैं।
ग्लोबल रिस्क और एनर्जी कॉस्ट
आयातित महंगाई भी घरेलू बाजार पर असर डाल रही है। भारतीय कच्चे तेल की बास्केट का भाव $100 प्रति बैरल को पार कर गया है, जिससे लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग लागत बढ़ रही है। हालांकि सरकार के पास गेहूं और चावल के पर्याप्त भंडार हैं, लेकिन सब्जियां और अन्य खराब होने वाली चीजों पर इसका नियंत्रण कम है।
फेस्टिव सीजन पर नजर
अब सबकी निगाहें त्योहारी सीजन पर टिकी हैं। क्या बढ़ती कीमतों के बावजूद उपभोक्ता मांग बरकरार रहेगी? निवेशक अब कंपनियों के अगले तिमाही नतीजों पर नजर रखेंगे कि कैसे वे इस मार्जिन प्रेशर को झेलती हैं और क्या महंगाई के कारण उनकी सेल्स वॉल्यूम में गिरावट देखने को मिलती है या नहीं।
