भारत की इकॉनमी ने अप्रैल-जून तिमाही में **7.8%** की रफ्तार के साथ सबको चौंका दिया है, जो RBI के **7.0%** के अनुमान से कहीं बेहतर है। हालांकि, दमदार डेटा के बावजूद शेयर बाजार आज गिरकर खुले हैं, जिसकी बड़ी वजह ग्लोबल मार्केट से आ रहे दबाव हैं।
आंकड़ों का दम
फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की रियल GDP ग्रोथ 7.8% दर्ज की गई, जो मार्केट के 7.1% के अनुमान को पीछे छोड़ गई है। 1 सितंबर, 2026 को बाजार भले ही दबाव में खुले, लेकिन इसकी मुख्य वजह ग्लोबल टेंशन है, न कि घरेलू कमजोरी। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने 9.2% की बढ़त दिखाई है, जबकि फाइनेंशियल सर्विसेज का सेक्टर 12.1% की रफ्तार से दौड़ा है। वहीं दूसरी तरफ, माइनिंग सेक्टर में 2.4% की गिरावट देखने को मिली, जो एक चिंता का विषय है।
क्या अब ब्याज दरें बढ़ेंगी?
इस दमदार ग्रोथ ने अब मौद्रिक नीति (Monetary Policy) पर नई बहस छेड़ दी है। RBI का रेपो रेट अभी 5.25% पर है। एनालिस्ट्स का मानना है कि अगर महंगाई का दबाव बना रहा, तो दिसंबर 2026 या 2027 की शुरुआत में ब्याज दरों में बढ़ोतरी (Rate Hike) की संभावना बढ़ सकती है। अब सबकी नजरें आगामी CPI डेटा पर टिकी हैं।
बाजार पर ग्लोबल दबाव का साया
घरेलू ग्रोथ का इंजन मजबूत है, लेकिन बाहर से आ रहे संकेत परेशान कर रहे हैं। अमेरिका के 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड के 4.77% के आसपास रहने के कारण FII आउटफ्लो बढ़ रहा है, जिससे भारतीय इक्विटी पर दबाव बना है। इसके अलावा, कच्चे तेल (Crude Oil) की अस्थिर कीमतें मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन के लिए खतरा बनी हुई हैं। निवेशकों के लिए अब ग्रोथ और ग्लोबल रिस्क के बीच संतुलन बनाए रखना ही सबसे बड़ी चुनौती है।
