कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने भारतीय ऑटो-कंपोनेंट कंपनियों को विकसित देशों में मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का सुझाव दिया है। इस कदम का लक्ष्य EVs और सेमीकंडक्टर के लिए जरूरी मिनरल्स की सप्लाई चेन को सुरक्षित करना है। वित्त वर्ष 2026 तक इस सेक्टर का टर्नओवर **₹7.59 लाख करोड़** तक पहुंच चुका है।
सरकार अब सप्लाई चेन की निर्भरता कम करने के लिए कूटनीति का सहारा ले रही है। कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल के मुताबिक, लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई के लिए अमेरिका, यूके और यूरोपीय देशों के साथ मजबूत साझेदारी की जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत के भविष्य के उद्योगों जैसे इलेक्ट्रिक व्हीकल और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को नई रफ्तार देना है।
बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव
अब तक भारतीय कंपनियां केवल एक्सपोर्ट पर निर्भर थीं, लेकिन सरकार अब 'मेक इन इंडिया' के साथ 'मैन्युफैक्चरिंग ऑन ग्लोबल सोइल्स' को बढ़ावा दे रही है। इसका मतलब है कि कंपनियां अब सीधे उन देशों में प्लांट लगाएंगी जहां उनकी डिमांड ज्यादा है। इससे लॉजिस्टिक कॉस्ट घटेगी और कंपनियां सीधे ग्लोबल वैल्यू चेन का हिस्सा बन सकेंगी। पिछले एक साल में सेक्टर का टर्नओवर ₹7.59 लाख करोड़ रहा है, जिसमें $24 बिलियन का बड़ा योगदान एक्सपोर्ट से आया है।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Risks for Investors)
हालांकि यह रणनीति लंबी अवधि में फायदेमंद है, लेकिन इसमें कई चुनौतियां भी हैं। विकसित देशों में प्लांट लगाना महंगा है, वहां का रेगुलेटरी माहौल अलग है और प्रतिस्पर्धा भी कड़ी है। साथ ही, कच्चे माल (Raw Materials) की कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर असर डाल सकता है। निवेशकों को सलाह है कि वे कंपनियों के डेट लेवल और नई इंटरनेशनल कैपेसिटी के विस्तार पर करीबी नजर रखें।
