सरकार की बदलती नीतियों से परेशान इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स ने अब 'इकोनॉमिक इम्पैक्ट असेसमेंट' को अनिवार्य करने की मांग की है। इस कदम का मकसद बिना सोचे-समझे नियम बनाने के बजाय डेटा-आधारित फैसले लेना है, ताकि मैन्युफैक्चरिंग और फिनटेक जैसे सेक्टर में निवेशकों का भरोसा बढ़े।
भारत में सरकारी नीतियों के अचानक बदलने का जो चक्र चल रहा है, अब उस पर लगाम लगाने की कवायद तेज हो गई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकार का अक्सर बिना किसी पूर्व चेतावनी के नियमों को लागू करने या वापस लेने का रवैया कंपनियों के लिए अनिश्चितता पैदा करता है, जिससे लंबी अवधि की बिजनेस प्लानिंग करना मुश्किल हो जाता है।\n\nइस अनिश्चितता का ताजा उदाहरण UPI ट्रांजेक्शन पर लगने वाले मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) से जुड़ी चर्चाएं हैं, जिनमें बार-बार बदलाव किए गए। इसके अलावा, साल 2025 में औद्योगिक इनपुट पर क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स को वापस लेने की घटना ने यह साफ कर दिया कि कई नियम बाजार के वास्तविक प्रभाव का आकलन किए बिना ही लागू किए गए थे।\n\n### कैबिनेट सचिवालय के सामने नया प्रस्ताव\n\nइस समस्या के समाधान के लिए अब यह मांग उठ रही है कि कैबिनेट सचिवालय को सभी बड़े नीतिगत प्रस्तावों के लिए अनिवार्य 'इकोनॉमिक इम्पैक्ट और इंसेंटिव स्टेटमेंट' पेश करना चाहिए। इस सिस्टम के तहत, मंत्रालयों को किसी भी नए नियम को लागू करने से पहले उसका तर्क देना होगा, विकल्पों पर विचार करना होगा और बाजार में प्रतिस्पर्धा पर पड़ने वाले असर का पूर्वानुमान लगाना होगा।\n\n### छिपी हुई लागत और प्रतिस्पर्धा पर असर\n\nमौजूदा समय में कई तरह के सरकारी दखल, जैसे जरूरी वस्तुओं पर प्राइस कैप या यूटिलिटी सेक्टर में क्रॉस-सब्सिडी, मार्केट में प्रतिस्पर्धा को बिगाड़ रहे हैं। एक औपचारिक असेसमेंट प्रोसेस यह तय करने में मदद करेगा कि इन नियमों की असली कीमत किसे चुकानी पड़ रही है और क्या इसका आउटपुट वास्तव में फायदेमंद है।\n\nभारतीय अर्थव्यवस्था को अपनी ग्रोथ की रफ्तार बनाए रखने के लिए अब साक्ष्य-आधारित (evidence-based) फ्रेमवर्क की जरूरत है। सरकार का लक्ष्य अब ऐसे सिस्टम की ओर बढ़ना है, जो लंबी अवधि की स्थिरता को प्राथमिकता दे और माइक्रोइकॉनोमिक एनालिसिस के जरिए निवेश के जोखिमों को कम करे।
