भारत के वाणिज्य सचिव (Commerce Secretary) अगस्त 2026 के आखिर में चिली की यात्रा पर जाएंगे। मकसद मौजूदा व्यापारिक रिश्तों को एक 'कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट' (CEPA) में बदलना है। इस कदम से भारत को लिथियम और कॉपर जैसे ज़रूरी खनिजों की सप्लाई पक्की करने में मदद मिलेगी, जिसका सीधा असर कोल इंडिया (Coal India) और हिंदुस्तान कॉपर (Hindustan Copper) जैसी खनन कंपनियों पर पड़ेगा।
भारत-चिली के बीच व्यापार बढ़ाने की तैयारी
भारत और चिली के बीच व्यापारिक रिश्ते मज़बूत होने वाले हैं। भारत के वाणिज्य सचिव, राजेश अग्रवाल, अगस्त 2026 के आखिर में चिली की राजधानी सेंटियागो का दौरा करेंगे। इस दौरे का मुख्य एजेंडा साल 2006 के 'प्रेफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट' को 'कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट' (CEPA) में बदलना है। इस नए समझौते से दोनों देशों के बीच व्यापार के रास्ते खुलेंगे और भारत को अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था और एनर्जी ट्रांजिशन के लिए ज़रूरी खनिजों की सप्लाई ज़्यादा आसानी से मिल सकेगी।
क्रिटिकल मिनरल्स पर खास फोकस
इस बातचीत का सबसे अहम हिस्सा 'क्रिटिकल मिनरल्स' होंगे, जिनमें लिथियम, कॉपर और मोलिब्डेनम शामिल हैं। ये खनिज भारत के क्लीन एनर्जी लक्ष्यों के लिए बेहद ज़रूरी हैं, खासकर इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बैटरियों के निर्माण और रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए। इस संभावित व्यापार समझौते में इन खनिजों के लिए एक खास चैप्टर जोड़कर, भारत अपनी सप्लाई चेन के रिस्क को कम करना चाहता है और किसी एक देश पर निर्भरता घटाना चाहता है। दुनिया भर में इन खनिजों की मांग तेज़ी से बढ़ रही है और दूसरे बड़े देश भी अपने भविष्य की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए माइनिंग राइट्स हासिल करने में लगे हैं।
भारतीय खनन कंपनियों पर असर
कुछ भारतीय सरकारी कंपनियां (PSUs) चिली में निवेश के अवसर तलाश रही हैं। कोल इंडिया (Coal India) कनाडा की कंपनी 'वेल्थ मिनरल्स' (Wealth Minerals) की एक यूनिट के अधिग्रहण पर बातचीत कर रही है, जिसके पास चिली में लिथियम के बड़े असेट्स हैं। हालांकि, यह डील रेगुलेटरी अप्रूवल और ड्यू डिलिजेंस पर निर्भर करती है। इसी तरह, हिंदुस्तान कॉपर (Hindustan Copper) चिली की सरकारी माइनिंग फर्म Codelco के साथ मिलकर कॉपर माइनिंग प्रोजेक्ट्स पर काम करने और कॉपर के माइनिंग ब्लॉक खरीदने की संभावना तलाश रही है। ये कदम भारतीय कंपनियों के लिए लंबे समय तक कच्चे माल की सप्लाई सुनिश्चित करने की कोशिश हैं, लेकिन सफलता चिली के माइनिंग नियमों और प्रोजेक्ट्स को पूरा करने पर निर्भर करेगी।
व्यापार और संभावित खतरे
साल 2025 में भारत और चिली के बीच द्विपक्षीय व्यापार $5.38 बिलियन तक पहुंच गया था। निर्यात में बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन आयात (मुख्य रूप से सोना और खनिज) तेज़ी से बढ़ा है, जिससे भारत का व्यापार घाटा (trade deficit) बढ़ा है। यह देखना अहम होगा कि नया व्यापार समझौता इस असंतुलन को कैसे दूर करता है और खनिजों के आयात को कैसे आसान बनाता है।
इसमें कुछ खतरे भी हैं। चिली का रेगुलेटरी माहौल काफी जटिल हो सकता है, जिसमें माइनिंग और पर्यावरण से जुड़े नियमों में बार-बार बदलाव हो सकते हैं, जिससे निवेश में देरी या रुकावट आ सकती है। इसके अलावा, इन खनिजों के लिए वैश्विक होड़ भारतीय कंपनियों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा पैदा कर रही है, जिससे माइनिंग असेट्स की लागत बढ़ सकती है। निवेशकों को आने वाली व्यापार वार्ताओं की प्रगति, माइनिंग प्रोजेक्ट्स के लिए लाइसेंस अप्रूवल और इन अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स की वित्तीय व्यवहार्यता पर नज़र रखनी होगी।
