CBAM Compliance: निर्यातकों की राह होगी आसान, EU से NABCB को मान्यता दिलाने की कवायद शुरू

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AuthorAditya Rao|Published at:
CBAM Compliance: निर्यातकों की राह होगी आसान, EU से NABCB को मान्यता दिलाने की कवायद शुरू

भारत सरकार यूरोपीय यूनियन (EU) के साथ बातचीत कर रही है ताकि नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर सर्टिफिकेशन बॉडीज (NABCB) को कार्बन फुटप्रिंट वेरिफिकेशन के लिए आधिकारिक मान्यता मिल सके। यह कदम सितंबर 2027 तक स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट सेक्टर के निर्यातकों के लिए कंप्लायंस को आसान बनाने के मकसद से उठाया गया है।

भारत सरकार वर्तमान में यूरोपीय यूनियन के साथ उच्च-स्तरीय बातचीत में जुटी है ताकि NABCB को आधिकारिक मान्यता दिलाई जा सके। यदि यह प्रयास सफल होता है, तो भारतीय वेरिफिकेशन एजेंसियां अपने घरेलू सामानों के कार्बन उत्सर्जन को खुद प्रमाणित कर सकेंगी। यह उन निर्यातकों के लिए एक बड़ा बदलाव होगा जो स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट जैसे सेक्टर में काम कर रहे हैं और यूरोपीय यूनियन के 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) की तैयारी कर रहे हैं।

निर्यातकों के लिए क्यों जरूरी है यह पहल?

फिलहाल भारतीय निर्यातकों को अपने प्रोडक्ट्स की कार्बन तीव्रता साबित करने के लिए काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लोकल वेरिफिकेशन के अभाव में उन्हें अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे खर्च बढ़ता है और रिपोर्टिंग प्रक्रिया जटिल हो जाती है। हालांकि भारतीय वेरिफायर्स को इस महीने EU के CBAM रजिस्ट्री का एक्सेस मिल गया है, जो एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन NABCB को पूर्ण मान्यता मिलना अभी भी मुख्य लक्ष्य है।

सितंबर 2027 की डेडलाइन और जोखिम

निर्यातकों के लिए सितंबर 2027 की तारीख काफी अहम है, क्योंकि तब से अनिवार्य CBAM रिटर्न फाइलिंग शुरू हो जाएगी। यदि कंपनियां सटीक डेटा नहीं दे पाती हैं, तो EU उनके प्रोडक्ट्स पर 'डिफ़ॉल्ट वैल्यूज' लागू कर सकता है। ये वैल्यूज अक्सर खराब प्रदर्शन करने वाले प्रोडक्शन सेंटर्स पर आधारित होती हैं, जिससे कार्बन लेवी का बोझ बढ़ जाता है और कंपनियों का प्रॉफिट मार्जिन सीधे तौर पर प्रभावित होता है।

ब्रिटेन के साथ बड़ी कामयाबी

EU के विपरीत, भारत ने यूनाइटेड किंगडम के साथ एक बड़ी सफलता हासिल कर ली है। ब्रिटेन ने 1 जनवरी 2027 से लागू होने वाले अपने कार्बन बॉर्डर मेजर्स के लिए NABCB को मान्यता दे दी है। इसके अलावा, UK ने भारत की 'कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम' (CCTS) के तहत किए गए भुगतान को भी स्वीकार कर लिया है, जिससे डबल टैक्सेशन का जोखिम खत्म हो गया है। भारत इसी मॉडल को अब ब्रुसेल्स के साथ बातचीत में एक उदाहरण के तौर पर पेश कर रहा है।

निवेशकों के लिए इस पूरी प्रक्रिया पर नजर रखना जरूरी है, क्योंकि यदि बातचीत सफल रहती है, तो निर्यातकों की लागत घटेगी और वे ग्लोबल मार्केट में अपनी प्रतिस्पर्धा बनाए रख पाएंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.