भारतीय सरकार ने एक ड्राफ्ट बिल पेश किया है जिसमें इंडिया-बेस्ड मैनेजर्स (India-based managers) का इस्तेमाल करने वाले ऑफशोर फंड्स (offshore funds) के लिए साइज और निवेशक की ज़रूरतों को आसान बनाया गया है। इस बदलाव का मकसद कंप्लायंस (compliance) को सरल बनाकर टैक्स से जुड़े जोखिमों को कम करना और ज़्यादा से ज़्यादा विदेशी पूंजी को आकर्षित करना है।
ऑफशोर फंड्स के लिए टैक्स नियमों में बदलाव
भारतीय सरकार विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा कदम उठा रही है। सरकार ने एक नया ड्राफ्ट बिल पेश किया है, जिसका उद्देश्य उन ऑफशोर फंड्स (offshore funds) के लिए टैक्स नियमों को सरल बनाना है जो भारत में स्थित फंड मैनेजर्स (fund managers) की सेवाएं लेते हैं। मौजूदा नियमों के तहत, इन फंड्स को टैक्स छूट का लाभ उठाने के लिए कुछ कड़े मानदंडों का पालन करना पड़ता है। इनमें कम से कम ₹100 करोड़ का कॉर्पस (corpus) बनाए रखना, कम से कम 20 निवेशक होना, और किसी एक निवेशक के निवेश पर कड़ी सीमाएं शामिल हैं। इन शर्तों को पूरा न करने पर, फंड्स को भारत से होने वाले मुनाफे पर 38% तक का भारी टैक्स देना पड़ सकता है।
कंप्लायंस (Compliance) का बोझ होगा कम
नए ड्राफ्ट बिल में इन कठोर साइज और डाइवर्सिफिकेशन (diversification) की ज़रूरतों को एक लचीले, सब्सटेंस-बेस्ड (substance-based) फ्रेमवर्क से बदलने का प्रस्ताव है। इस बदलाव से फंड मैनेजर्स के लिए भारत में ऑफिस खोलना और स्थानीय प्रबंधकों को नियुक्त करना आसान हो जाएगा, बिना इस डर के कि उन्हें भारत में एक टैक्सेबल बिजनेस कनेक्शन (taxable business connection) माना जाएगा। हालांकि, इस सुविधा के साथ कुछ सुरक्षा उपाय भी शामिल हैं। प्रस्तावित नियमों के तहत, फंड्स को अपने डोमेस्टिक इन्वेस्टर एसेट्स (domestic investor assets) को 5% तक सीमित रखना होगा और वे भारत में किसी बिजनेस को कंट्रोल (control) नहीं कर पाएंगे। इसका मतलब है कि टैक्स लाभ मुख्य रूप से फंड मैनेजमेंट एक्टिविटीज़ (fund management activities) के लिए ही होंगे, न कि सीधे कॉर्पोरेट ओनरशिप (corporate ownership) के लिए।
मार्केट पर संभावित असर
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह नीतिगत बदलाव 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (ease of doing business) को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह उन ऑपरेशनल मुश्किलों को दूर करेगा जिन्होंने पहले कई ऑफशोर फंड्स को लोकल इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स (local investment managers) को हायर करने से रोका था। सरकार को उम्मीद है कि इससे भारत में फंड मैनेजमेंट इकोसिस्टम (fund management ecosystem) का विस्तार होगा। यह कदम ऐसे समय में आया है जब अस्थिरता और कैपिटल आउटफ्लो (capital outflows) के बीच स्थिर विदेशी पूंजी को आकर्षित करना भारत के लिए प्राथमिकता है। इन प्रस्तावित बदलावों से ग्लोबल एंटिटीज़ (global entities) को भारत में अपने इन्वेस्टमेंट डिसीजन-मेकिंग प्रोसेस (investment decision-making processes) को सेंट्रलाइज (centralize) करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में लिक्विडिटी (liquidity) और प्रोफेशनल एक्टिविटी (professional activity) बढ़ सकती है। निवेशकों को इस बिल की प्रगति पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि इसके फाइनल होने पर ही इसे लागू किया जाएगा।
