भारत में प्राइवेट प्रोजेक्ट्स का निवेश सितंबर 2026 तक बढ़कर ₹99.7 लाख करोड़ हो गया है, जो कि **39%** की जबरदस्त ग्रोथ है। हालांकि, यह निवेश कुछ ही क्षेत्रों और राज्यों तक सीमित है, जिससे प्रोजेक्ट्स के पूरा होने पर सवाल उठ रहे हैं।
सितंबर 2026 तक भारत में प्राइवेट सेक्टर का कुल निवेश ₹99.7 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। यह पिछले साल के मुकाबले 39% की बढ़ोतरी है, जो यह दिखाता है कि कंपनियां बड़े स्तर पर खर्च की तैयारी में हैं। हालांकि, गहराई से देखें तो यह ग्रोथ उतनी व्यापक नहीं है जितनी दिख रही है। पिछले दो वर्षों में नए प्रोजेक्ट्स की संख्या में केवल 18% का इजाफा हुआ है, जिसका मतलब है कि सारा पैसा कुछ गिने-चुने बड़े प्रोजेक्ट्स में ही लग रहा है।
IT और पावर सेक्टर पर निर्भरता
कुल सालाना ग्रोथ का 87% हिस्सा केवल IT-एनेबल्ड सर्विसेज और पावर सेक्टर से आया है। IT सेक्टर में निवेश ₹2.2 लाख करोड़ से बढ़कर ₹18.9 लाख करोड़ हो गया है। डिजिटल सर्विसेज की मांग तो बहुत है, लेकिन इतनी भारी निर्भरता का मतलब है कि निवेश का दायरा दूसरे उद्योगों तक नहीं फैल रहा है।
पावर सेक्टर और राज्यों की चुनौती
पावर सेक्टर में एक बड़ा असंतुलन नजर आ रहा है। कंपनियां पावर जनरेशन में ₹32 लाख करोड़ लगाने की बात कर रही हैं, लेकिन ट्रांसमिशन लाइनों के लिए सिर्फ ₹0.17 लाख करोड़ का ही प्लान है। इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से प्रोजेक्ट्स में देरी और बॉटलनेक्स (bottlenecks) का खतरा बढ़ गया है।
साथ ही, भौगोलिक असमानता भी चिंताजनक है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और उत्तर प्रदेश जैसे 5 राज्यों में ही कुल सालाना वृद्धि का 94% हिस्सा है, जिसमें अकेले महाराष्ट्र की हिस्सेदारी 29% है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
Union Bank of India के जानकारों का मानना है कि अब कर्ज देने वाली संस्थाओं का नजरिया बदलने लगा है। अब सिर्फ प्रोजेक्ट की कुल वैल्यू नहीं, बल्कि उसकी वायबिलिटी (viability) और इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारी देखी जा रही है। निवेशकों के लिए सलाह यही है कि केवल बड़े आंकड़ों के बहकावे में न आएं, बल्कि यह देखें कि कंपनी जमीन पर प्रोजेक्ट को पूरा करने की क्षमता रखती है या नहीं।
