भारत में प्राइवेट सेक्टर का निवेश तेजी से बढ़ रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में नए प्रोजेक्ट्स का सैंक्शन ₹5.63 लाख करोड़ के आंकड़े को छू गया है। पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर इस ग्रोथ के मुख्य इंजन बने हुए हैं।
भारत में प्राइवेट कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) एक नई रफ्तार पकड़ रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, फाइनेंशियल ईयर 2026 में फ्रेश प्रोजेक्ट सैंक्शन्स का आंकड़ा ₹5.63 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 13% अधिक है। इस साल कुल 1,839 नए प्रोजेक्ट्स शुरू हुए हैं, जबकि पिछले साल यह संख्या 1,581 थी। यह इस बात का संकेत है कि ग्लोबल अनिश्चितता के बावजूद भारतीय कंपनियों का भरोसा अभी भी मजबूत है।
फंडिंग के बदलते तरीके
निवेश के इस दौर में कंपनियों ने फंड जुटाने के तरीकों में बदलाव किया है। हालांकि बैंक अभी भी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए कर्ज का मुख्य स्रोत हैं, लेकिन कंपनियां अब तेजी से इक्विटी मार्केट का रुख कर रही हैं। यह शिफ्ट कंपनियों को अपना बैलेंस शीट मजबूत रखने और ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव के असर को कम करने में मदद कर रही है।
दिग्गज कंपनियों का दबदबा
पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में सबसे ज्यादा निवेश देखने को मिल रहा है। हालांकि, यह ग्रोथ कुछ हद तक केंद्रित है। आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 के कुल प्राइवेट Capex में अकेले Adani और Reliance जैसी दिग्गज कंपनियों का योगदान करीब 28% है। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि निवेश चक्र फिलहाल इन बड़े प्लेयर्स की कार्यक्षमता और कैपिटल एलोकेशन पर काफी हद तक निर्भर है।
प्रोजेक्ट्स की हेल्थ और जोखिम
अच्छी खबर यह है कि प्रोजेक्ट्स की क्वालिटी में बड़ा सुधार आया है। इस साल ठप या बंद हुए प्रोजेक्ट्स की दर 0.1% से भी कम रही है, जो यह दर्शाता है कि कंपनियां अब प्रोजेक्ट्स की व्यावहारिकता को लेकर कहीं ज्यादा सतर्क हैं।
हालांकि, निवेशकों को बाहरी जोखिमों पर नजर रखनी चाहिए। वेस्ट एशिया में चल रहे जियो-पॉलिटिकल तनाव के कारण अगर क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ती हैं, तो पावर और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा, ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में तेजी भी इक्विटी फंड जुटाने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
