5वें Kautilya Economic Conclave में भारत सरकार ने अपनी नई रणनीति का ऐलान किया है। अब देश का पूरा फोकस 'इकोनॉमिक रेजिलिएंस' पर है ताकि ग्लोबल सप्लाई चेन में होने वाली उथल-पुथल से अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सके।
नई दिल्ली में आयोजित 5वें Kautilya Economic Conclave में भारत सरकार का विजन बिल्कुल साफ है। प्रधानमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी PK Mishra ने स्पष्ट किया कि बदलती दुनिया में सिर्फ 'कॉस्ट एफिशिएंसी' काफी नहीं है, बल्कि 'रेजिलिएंस' यानी मजबूती अब एक आर्थिक जरूरत बन चुकी है।
GDP की रफ्तार और चुनौतियां
भारतीय अर्थव्यवस्था फिलहाल मजबूती से आगे बढ़ रही है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली तिमाही में रियल GDP ने 7.8% की ग्रोथ दिखाई है। हालांकि दूसरी तिमाही के लिए मिनिस्ट्री ऑफ फाइनेंस ने इसे 7.3% रहने का अनुमान जताया है, लेकिन सरकार का लक्ष्य बाहरी झटकों के बावजूद इस मोमेंटम को बरकरार रखना है।
एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग पर बड़ा दांव
सरकार अब सप्लाई चेन को लेकर किसी एक देश पर निर्भर रहने की गलती नहीं दोहराना चाहती:
- एनर्जी सिक्योरिटी: भारत अब दुनिया के 43 देशों से कच्चा तेल खरीद रहा है, ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य या रेड सी जैसे संकटों का असर घरेलू कीमतों पर न पड़े।
- डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग: इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और फार्मास्युटिकल्स सेक्टर में कैपेसिटी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
निवेशकों के लिए यह एक संकेत है कि सरकार लंबी अवधि की संरचनात्मक स्वतंत्रता (Structural Independence) के लिए बड़े कैपिटल खर्च करने को तैयार है। हालांकि, ग्लोबल फाइनेंशियल वोलेटिलिटी और ट्रेड फ्रैगमेंटेशन जैसे रिस्क अभी भी बने हुए हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार कैसे बड़े पब्लिक इन्वेस्टमेंट और फिस्कल कंसोलिडेशन के बीच संतुलन बनाए रखती है।
