भारतीय सरकार देश में AI टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने के लिए **$25 बिलियन** का निवेश करने की योजना बना रही है। इस कदम का लक्ष्य विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करना है, लेकिन ग्लोबल मार्केट में 'सर्कुलर फाइनेंसिंग' के बढ़ते खतरों के बीच निवेशकों को सावधानी बरतनी होगी।
भारत सरकार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए $25 बिलियन का एक बड़ा कैपिटल पूल तैयार कर रही है। पिछले एक दशक में भारत ने इस सेक्टर में $11.6 बिलियन का निवेश किया था, जिसके मुकाबले यह नई योजना सरकारी फंडिंग में एक बड़ी छलांग है। तुलना के लिए, अमेरिका ने अकेले 2025 फाइनेंशियल ईयर में AI पर $1.162 ट्रिलियन खर्च किए हैं, जो ग्लोबल इन्वेस्टमेंट के पैमाने में बड़े अंतर को दिखाता है।
'सर्कुलर फाइनेंसिंग' का ग्लोबल रिस्क
जैसे-जैसे भारत इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रहा है, ग्लोबल इकोनॉमिस्ट 'सर्कुलर फाइनेंसिंग' (Circular Financing) को लेकर आगाह कर रहे हैं। यह वह स्थिति है जहाँ बड़ी टेक कंपनियां AI स्टार्टअप्स में अरबों का निवेश करती हैं, और स्टार्टअप्स उसी पैसे का इस्तेमाल उन कंपनियों से क्लाउड सर्विसेज खरीदने में करते हैं। इससे रेवेन्यू बढ़ने का भ्रम पैदा होता है, जबकि असल में पैसा एक लूप में घूम रहा होता है। अगर कंपनियां वास्तविक ग्राहकों से मुनाफा नहीं कमा पाती हैं, तो मार्केट में बड़ी गिरावट का खतरा बना रहता है।
निवेशकों को किन बातों पर नजर रखनी चाहिए?
भारतीय निवेशकों के लिए यह कदम विकास के नए अवसर तो लाता है, लेकिन साथ ही फिस्कल रिस्क (Fiscal Risk) भी हैं। सरकार का इरादा प्राइवेट सेक्टर की अटकलों से बचकर बुनियादी ढांचे, एकेडमिक रिसर्च और वर्कफोर्स डेवलपमेंट पर ध्यान केंद्रित करना है।
निवेशकों को यह देखना चाहिए कि फंडिंग का ढांचा क्या है। यदि यह पूंजी ऑडिट और ठोस माइलस्टोन्स पर आधारित है, तो यह सस्टेनेबल ग्रोथ की ओर ले जाएगी। वहीं, यदि बिना सख्त निगरानी के पैसा बांटा गया, तो यह इनएफिशिएंसी (Inefficiency) पैदा कर सकता है। मार्केट पर नजर रखने वाले यह देखें कि क्या फंड पाने वाली कंपनियों के पास सरकारी सपोर्ट के अलावा वास्तविक और भुगतान करने वाले ग्राहक हैं या नहीं।
