2035 तक भारत में बिजली की खपत **5.56%** की सालाना दर से बढ़ने का अनुमान है। इस मांग को डेटा सेंटर्स और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे सेक्टर गति देंगे, जिसके लिए ग्रिड मॉडर्नाइजेशन में भारी निवेश की जरूरत होगी।
भारत अब ऊर्जा उपभोग के एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। अनुमान है कि साल 2035 तक बिजली की मांग 5.56% की सालाना दर से बढ़ेगी, जबकि कुल ऊर्जा मांग में यह बढ़ोतरी 2.47% के आसपास रहने का अनुमान है। इस बड़े बदलाव के बाद, देश की कुल ऊर्जा बास्केट में बिजली की हिस्सेदारी मौजूदा 19% से बढ़कर 25% तक पहुंच जाएगी।
बड़े कंज्यूमर्स की एंट्री
इस बिजली मांग के पीछे सबसे बड़ा हाथ ऊर्जा-गहन इंफ्रास्ट्रक्चर का है। डेटा सेंटर्स और ग्रीन हाइड्रोजन प्रोडक्शन यूनिट्स की बिजली खपत 2035 तक करीब 9 गुना बढ़कर 240 टेरावॉट-घंटे (TWh) तक पहुंच सकती है। चूंकि इन सेक्टरों को लगातार और निर्बाध बिजली की जरूरत होती है, इसलिए अब कंपनियों को केवल क्षमता बढ़ाने के बजाय ग्रिड स्टेबिलिटी पर ज्यादा ध्यान देना होगा।
इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रिड मॉडर्नाइजेशन
सिर्फ बिजली पैदा करना अब काफी नहीं है। पुराने ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने के लिए भारी निवेश की जरूरत है। अगले दशक में 'डिस्ट्रिब्यूटेड जनरेशन' की हिस्सेदारी मौजूदा 13% से बढ़कर 16% होने की उम्मीद है, जो बिजली वितरण के तरीके को पूरी तरह बदल देगा।
निवेशकों के लिए जोखिम (Investor Risks)
यह अवसर जितना बड़ा है, इसमें जोखिम भी उतने ही गहरे हैं। भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) के कारण कंपनियों की बैलेंस शीट पर दबाव बढ़ सकता है और अगर ऑपरेशनल एफिशिएंसी कम रही, तो कर्ज का बोझ चिंताजनक हो सकता है। इसके अलावा, डेटा सेंटर्स की अनिश्चित लोड प्रोफाइल से ग्रिड में अस्थिरता का खतरा भी बना रहता है। निवेशकों को कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी, ग्रिड रिलायबिलिटी स्टैंडर्ड्स और रेगुलेटरी टैरिफ में होने वाले बदलावों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
