भारत सरकार विदेशी निवेश को बढ़ावा देने और मैन्युफैक्चरिंग को रफ्तार देने के लिए FDI नियमों में बड़ा बदलाव करने जा रही है। सरकार कैबिनेट क्लियरेंस की सीमा को बढ़ाकर **₹15,000 करोड़** करने पर विचार कर रही है, जिससे बड़े प्रोजेक्ट्स के काम में तेजी आएगी।
रेड टेप कम करने की कोशिश
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के नेतृत्व में सरकार का पूरा जोर प्रशासनिक बाधाओं को कम करने पर है। अभी तक ₹5,000 करोड़ से अधिक के प्रोजेक्ट्स के लिए 'कैबिनेट कमिटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स' (CCEA) की मंजूरी अनिवार्य होती है, जिसमें काफी समय लग जाता है। इस सीमा को ₹15,000 करोड़ करने का प्रस्ताव कंपनियों को तेजी से प्रोडक्शन शुरू करने में मदद करेगा।
पिछले फैसलों का असर
मई 2026 में सरकार ने पड़ोसी देशों के लिए FDI नियमों में ढील दी थी, जिसमें 10% या उससे कम की नॉन-कंट्रोलिंग बेनिफिशियल ओनरशिप वाले निवेशकों को ऑटोमैटिक रूट का रास्ता मिला। इसका असर साफ दिख रहा है, क्योंकि अब तक 29 प्रपोजल्स के जरिए करीब ₹4,895 करोड़ का निवेश मंजूर किया जा चुका है।
अब फोकस 'डीप-वैल्यू' मैन्युफैक्चरिंग पर
सरकार अब केवल असेंबली पर निर्भर रहने के बजाय स्पेशलिटी केमिकल्स और इंडस्ट्रियल गैस जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता चाहती है। टाइटेनियम डाइऑक्साइड (Titanium Dioxide) जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल का घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ाया जा रहा है, ताकि आयात बिल को कम किया जा सके।
हालांकि, 10% की 'सेफ हार्बर' लिमिट के बावजूद होल्डिंग स्ट्रक्चर की जांच प्रक्रिया काफी कड़ी बनी हुई है। निवेशकों के लिए अब नजर इस बात पर है कि कब तक इस प्रस्तावित बदलाव का आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी होता है, क्योंकि यही भारत के मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की राह में एक बड़ा माइलस्टोन होगा।
