सरकार गिग वर्कर्स की सुरक्षा के लिए एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म्स पर **2%** का ट्रांजेक्शन लेवी लगाने की तैयारी कर रही है। यह नियम **2027** तक लागू हो सकता है, जिससे फूड डिलीवरी, क्विक कॉमर्स और राइड-हेलिंग कंपनियों के बिजनेस मॉडल पर असर पड़ना तय है।
भारत सरकार गिग वर्कर्स को सोशल सिक्योरिटी देने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। इसके तहत एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म्स पर हर ट्रांजेक्शन पर 2% का शुल्क लगाया जाएगा। यह फंड 2027 तक पूरी तरह ऑपरेशनल हो जाएगा, जिसका उपयोग वर्कर्स के लाइफ, हेल्थ और एक्सीडेंट इंश्योरेंस के लिए किया जाएगा। इस पूरी लागत का बोझ प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स पर होगा।
टर्नओवर से ट्रांजेक्शन मॉडल की ओर बदलाव
पहले कंपनियां अपने कुल टर्नओवर के आधार पर कल्याणकारी फंड में योगदान देती थीं, लेकिन अब सरकार इसे सीधे बिजनेस वॉल्यूम से जोड़ रही है। इस बदलाव का मकसद एक समान सिस्टम बनाना है, ताकि अलग-अलग सेक्टर्स अपनी रेवेन्यू कैलकुलेशन के हिसाब से लाभ न उठा सकें।
निवेशकों के लिए जोखिम और अवसर
शेयरहोल्डर्स के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि कंपनियां इस 2% के अतिरिक्त खर्च को कैसे मैनेज करेंगी। दो ही रास्ते हैं:
- मार्जिन पर असर: कंपनियां खुद इस खर्च को उठाएं, जिससे नेट प्रॉफिट कम हो सकता है।
- कस्टमर पर बोझ: डिलीवरी फीस या सर्विस चार्ज बढ़ाकर इस लागत को ग्राहकों पर डाला जाए। हालांकि, भारत जैसे प्राइस-सेंसिटिव मार्केट में दाम बढ़ाने से डिमांड घटने का भी खतरा है।
रेगुलेटरी चुनौतियां
केंद्र के इस नेशनल फ्रेमवर्क के साथ राज्यों के लेबर कानूनों का तालमेल बैठाना भी एक चुनौती होगी। कर्नाटक जैसे राज्यों ने पहले ही अपने स्तर पर उपाय शुरू कर दिए हैं। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी होगी कि कंपनियां फेडरल और स्टेट, दोनों स्तरों पर अनुपालन (Compliance) कैसे करती हैं।
पात्रता के नियम
लाभ पाने के लिए वर्कर्स को परफॉर्मेंस थ्रेशोल्ड पूरा करना होगा—जैसे किसी एक प्लेटफॉर्म पर 90 दिन या मल्टीपल प्लेटफॉर्म्स पर 120 दिन काम का रिकॉर्ड होना जरूरी है।
30 अक्टूबर, 2026 को अधिसूचित 'नेशनल सोशल सिक्योरिटी बोर्ड' नवंबर के अंत में इस पर विस्तार से चर्चा करेगा। आने वाले फाइनेंशियल ईयर में कंपनियों की अर्निंग कॉल और मैनेजमेंट की कमेंट्री इस मामले में क्लैरिटी के लिए बेहद अहम होगी।
