भारत ने अपने सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। 2027 में रूस के Northern Sea Route (NSR) के जरिए पहला कार्गो शिप भेजने की तैयारी है।
भारत अब ग्लोबल ट्रेड रूट्स को लेकर अपनी निर्भरता कम करने के मिशन पर है। इसी रणनीति के तहत 2027 में पहली बार 'नॉर्दर्न सी रूट' (NSR) के जरिए कार्गो शिपिंग का ट्रायल किया जाएगा। इस कदम का मुख्य मकसद रेड सी और स्वेज नहर जैसे रास्तों पर बढ़ते जियो-पॉलिटिकल तनाव के कारण होने वाली सप्लाई चेन की बाधाओं से निपटना है।
क्यों है यह रास्ता खास?
इस रूट का सबसे बड़ा फायदा दूरी कम होना है। एशिया से उत्तरी यूरोप के बीच की समुद्री दूरी पारंपरिक रास्तों के मुकाबले 40% तक कम हो सकती है। हालांकि, निवेशकों के लिए यह जानना जरूरी है कि यह फिलहाल कोई कमर्शियल विकल्प नहीं, बल्कि एक 'लॉन्ग-टर्म इंश्योरेंस पॉलिसी' है। यह रास्ता साल भर खुला नहीं रहता, बल्कि बर्फ के कारण केवल जुलाई से अक्टूबर के बीच ही यहां जहाज चल सकते हैं।
चुनौतियां और लागत
आर्कटिक में शिपिंग करना महंगा सौदा है। इसके लिए खास तौर पर तैयार किए गए 'आइस-स्ट्रेंथन्ड' जहाजों और आइसब्रेकर सपोर्ट की जरूरत होती है, जिससे शिपिंग कॉस्ट काफी बढ़ जाती है। साथ ही, आर्कटिक पोर्ट्स पर कंटेनर हैंडलिंग की बुनियादी सुविधा नहीं है, जो इसे स्वेज नहर का मुकाबला करने से रोकती है।
भारत की बड़ी मैरिटाइम स्ट्रैटेजी
यह प्रोजेक्ट भारत की व्यापक समुद्री नीति का हिस्सा है, जिसमें 'चेन्नई-व्लादिवोस्तोक ईस्टर्न मैरिटाइम कॉरिडोर' और 'इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर' जैसे प्रोजेक्ट्स पहले से शामिल हैं। भारत चाहता है कि व्यापार के लिए उसके पास एक से ज्यादा भरोसेमंद रास्ते हों।
निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे 2027 के इस ट्रायल पर नजर रखें। इसमें कार्गो यूनिट की लागत, इंश्योरेंस की उपलब्धता और आइस-क्लास जहाजों की उपलब्धता जैसे फैक्टर्स भविष्य में लॉजिस्टिक्स और एनर्जी सेक्टर के लिए बड़े गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं।
