भारत सरकार ने डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। 2026 के 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल' के पास होने से अब UPI और RuPay ट्रांजैक्शन पर भविष्य में मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू हो सकता है। हालांकि, सरकार ने साफ किया है कि आम लोगों के लिए एक-दूसरे को पैसे भेजना (P2P ट्रांसफर) हमेशा की तरह फ्री रहेगा।
क्या है ये नया कानून?
भारत सरकार ने हाल ही में 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026' को मंजूरी दी है। इस बिल के तहत, अब यह संभव होगा कि कुछ खास UPI और RuPay ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) यानी मर्चेंट फीस वसूली जाए। यह भारत की डिजिटल पेमेंट व्यवस्था के लिए एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि अब तक UPI पर कंज्यूमर और मर्चेंट दोनों के लिए कोई फीस नहीं लगती थी।
अंतरराष्ट्रीय दबाव या सिस्टम की मजबूती?
यह कानून ऐसे समय में आया है जब अमेरिका ने मार्च 2026 में भारत की जीरो-MDR पॉलिसी को अमेरिकी पेमेंट फर्मों के लिए एक ट्रेड बैरियर बताया था। हालांकि, भारतीय वित्त मंत्रालय ने इन दावों को खारिज कर दिया है। मंत्रालय का कहना है कि यह कदम अंतरराष्ट्रीय दबाव में नहीं, बल्कि UPI जैसे बड़े डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम की लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल सस्टेनेबिलिटी, सिक्योरिटी और साइबर सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है। इस इकोसिस्टम का सालाना वैल्यू खरबों डॉलर में है।
निवेशकों के लिए क्यों है अहम?
हर महीने अरबों ट्रांजैक्शन को प्रोसेस करने के लिए सर्वर, सॉफ्टवेयर अपडेट और सिक्योरिटी पर भारी खर्च आता है। मर्चेंट साइड से कोई रेवेन्यू न होने के कारण यह बोझ पेमेंट एग्रीगेटर्स और बैंकों पर पड़ता है, जिससे सिस्टम की स्केलेबिलिटी पर सवाल उठते हैं। यह नया कानून सरकार को यह तय करने की फ्लेक्सिबिलिटी देता है कि किन ट्रांजैक्शन्स पर एक छोटी फीस लगाई जा सकती है।
आम आदमी पर क्या होगा असर?
सरकार ने भरोसा दिलाया है कि इस बदलाव से आम यूजर्स पर कोई असर नहीं पड़ेगा। एक-दूसरे को पैसे भेजने वाले ट्रांजैक्शन, जो UPI का बड़ा हिस्सा हैं, पूरी तरह फ्री रहेंगे। भविष्य में अगर कोई फीस लागू होती भी है, तो वह केवल एक खास लिमिट, जैसे ₹2,000 से ऊपर के हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शन्स पर ही लागू हो सकती है। इसका मकसद छोटे व्यापारियों को डिजिटल पेमेंट अपनाने से हतोत्साहित किए बिना, ऑपरेशनल कॉस्ट निकालना है।
आगे क्या?
निवेशकों को अब नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और वित्त मंत्रालय की तरफ से आने वाली सूचनाओं पर नजर रखनी होगी। ये संस्थाएं ही भविष्य में MDR की फाइनल स्ट्रक्चर, लिमिट और रेट तय करेंगी। कानून तो पास हो गया है, लेकिन इसका असली असर फिनटेक कंपनियों के बिजनेस मार्जिन और मर्चेंट्स की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा कि यह फीस कितनी और कैसे लागू होती है।
