भारत में छोटे कारोबारियों के लिए एक नई 'नैनो' बिज़नेस कैटेगरी बनाने की मांग जोर पकड़ रही है। एक संसदीय समिति का मानना है कि मौजूदा 'माइक्रो' क्लासिफिकेशन बहुत बड़ा है, जिससे सबसे छोटे और असंगठित व्यवसायों तक सरकारी मदद और लोन पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। हालांकि, MSME मंत्रालय ने इसे लागू करने में व्यावहारिक दिक्कतों को लेकर चिंता जताई है।
क्यों है 'नैनो' कैटेगरी की ज़रूरत?
संसदीय समिति, विशेष रूप से उद्योग मामलों पर राज्यसभा की स्थायी समिति, का तर्क है कि वर्तमान 'माइक्रो' श्रेणी बहुत व्यापक है। इस श्रेणी में छोटी घरेलू इकाइयों से लेकर बड़े टर्नओवर वाले व्यवसाय तक शामिल हैं। समिति का मानना है कि इससे 7.6 करोड़ से अधिक पंजीकृत उद्यमों में से सबसे छोटे, जिनका टर्नओवर लगभग ₹10 लाख तक है, उन्हें ज़रूरी मदद नहीं मिल पाती। समिति ने केरल मॉडल का उदाहरण दिया है, जहाँ पहले से ही ₹10 लाख के निवेश वाली घरेलू व्यवसायों के लिए एक अलग वर्गीकरण है, जिससे उन्हें विशिष्ट सहायता मिल पाती है।
मंत्रालय की चिंताएं और व्यावहारिक चुनौतियां
वहीं, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) मंत्रालय ने इस नए वर्गीकरण को बनाने में प्रशासनिक जटिलताओं का ज़िक्र किया है। मंत्रालय के अनुसार, ये बहुत छोटे व्यवसाय अक्सर मौसमी होते हैं और उनके पास ऑडिटेड वित्तीय विवरण (audited financial statements) नहीं होते। उनके संचालन का पैमाना जल्दी बदल सकता है और वे अक्सर अनौपचारिक क्षेत्र (informal sector) में काम करते हैं, जिस कारण इस नई श्रेणी के लिए स्थिर और सत्यापन योग्य मानदंड (verifiable criteria) बनाना मुश्किल हो सकता है। मंत्रालय को यह भी चिंता है कि इससे पीएम विश्वकर्मा और पीएम मुद्रा जैसी मौजूदा योजनाओं के साथ प्रयासों का दोहराव (overlapping efforts) हो सकता है।
अर्थव्यवस्था और निवेशकों के लिए क्या है मायने?
यह बहस भारत की विशाल अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (informal economy) को औपचारिक बनाने के सरकार के व्यापक प्रयासों के बीच हो रही है। हाल ही में पास हुए MSME डेवलपमेंट (अमेंडमेंट) बिल, 2026 का उद्देश्य डिजिटल पंजीकरण और अनिवार्य इनवॉइस निपटान के माध्यम से तरलता (liquidity) और औपचारिकता में सुधार करना है। अगर सरकार छोटे व्यावसायिक इकाइयों को सफलतापूर्वक परिभाषित और ट्रैक कर पाती है, तो इससे क्रेडिट फ्लो (credit flow) में सुधार हो सकता है, लोन डिफॉल्ट (loan defaults) कम हो सकते हैं और अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली में एकीकृत (integrate) किया जा सकता है।
समिति ने मंत्रालय की चिंताओं को खारिज करते हुए कहा है कि प्रशासनिक चुनौतियां विकास में बाधा नहीं बननी चाहिए। इसके बजाय, समिति ने भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), सिडबी (SIDBI), और राज्य सरकार के प्रतिनिधियों को शामिल करके एक कार्यसमूह (working group) बनाने का निर्देश दिया है। अब निवेशकों और नीति निर्माताओं की नज़रें इस कार्यसमूह की रिपोर्ट पर होंगी, जो तय करेगा कि 'नैनो' कैटेगरी भारत के व्यावसायिक परिदृश्य का हिस्सा बनती है या नहीं।
