Ministry of Statistics and Programme Implementation (MoSPI) ने GDP कैलकुलेशन के तरीके में बड़े बदलाव किए हैं। अब सरकार स्टेट-लेवल पर कंजम्पशन (Consumption) और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट (Private Investment) को ज्यादा बारीकी से ट्रैक करेगी।
अब खर्च के आधार पर मापी जाएगी ग्रोथ
Ministry of Statistics and Programme Implementation (MoSPI) ने भारत की आर्थिक प्रगति को मापने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। अब देश अब उत्पादन (Production) के बजाय खर्च (Expenditure) आधारित फ्रेमवर्क पर ध्यान केंद्रित करेगा। इस नई प्रणाली से यह साफ हो सकेगा कि देश में पैसा कहां खर्च हो रहा है—चाहे वह घरेलू उपभोग (Household Consumption) हो, सरकारी खर्च हो या फिर कॉरपोरेट इन्वेस्टमेंट।
डेटा में होगी ज्यादा पारदर्शिता
यह नया बदलाव ऐतिहासिक डेटा में मौजूद गैप को भरने के लिए लाया गया है, जिस पर पहले IMF जैसी संस्थाएं सवाल उठा चुकी थीं। यह कदम फरवरी 2026 में अपनाए गए 2022-23 के बेस ईयर का ही हिस्सा है। सरकार अब हाई-फ्रीक्वेंसी डेटा का इस्तेमाल करेगी, जिसमें GST रिकॉर्ड्स, 'वाहन' पोर्टल से मिली गाड़ियों की बिक्री, Reserve Bank of India (RBI) के पर्सनल लोन आंकड़े और Central Electricity Authority (CEA) की बिजली खपत की जानकारी शामिल होगी।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
भले ही यह सीधे स्टॉक मार्केट का इवेंट न हो, लेकिन यह इकोनॉमी की सेहत समझने का एक बेहतर टूल है। सरकारी खर्च और प्राइवेट सेक्टर के इन्वेस्टमेंट के बीच का अंतर साफ होने से निवेशकों को यह समझने में आसानी होगी कि डिमांड कितनी टिकाऊ है। हालांकि, बाजार के जानकारों का मानना है कि GDP के आंकड़ों और कंपनियों की अर्निंग्स (Corporate Earnings) में हमेशा तालमेल रहे, यह जरूरी नहीं है। प्रॉफिट मार्जिन और ग्लोबल डिमांड जैसे फैक्टर्स का असर स्टॉक मूवमेंट्स पर ज्यादा होता है, लेकिन एक बेहतर डेटा फ्रेमवर्क पॉलिसी मेकिंग और इंटरेस्ट रेट के फैसलों में निर्णायक भूमिका जरूर निभाएगा।
