आज से भारत में ई-कॉमर्स एक्सपोर्ट के लिए इन्वेंट्री-आधारित मॉडल में विदेशी निवेश (FDI) की नई व्यवस्था लागू हो गई है। इस नई नीति का मकसद भारतीय कंपनियों के एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना है, ताकि वे वैश्विक डिजिटल व्यापार बाजार में अपनी जगह बना सकें।
विदेशी निवेश (FDI) की नई व्यवस्था का आगाज
सरकार ने ई-कॉमर्स एक्सपोर्ट के लिए इन्वेंट्री-आधारित मॉडल में विदेशी सीधी निवेश (FDI) को मंजूरी देने वाले नए नियमों को आज, 5 अगस्त, 2026 से लागू कर दिया है। यह नीति 'डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड' (DGFT) द्वारा जारी की गई है और यह 23 जुलाई, 2026 को 'डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड' (DPIIT) द्वारा की गई घोषणा का हिस्सा है। इस बड़े बदलाव के तहत, अब फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) को एक्सपोर्ट के लिए इन्वेंट्री-आधारित ई-कॉमर्स बिजनेस मॉडल में अनुमति दी गई है। हालांकि, इसकी एक बड़ी शर्त यह है कि यह मॉडल केवल भारतीय निर्मित सामानों के एक्सपोर्ट के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकता है।
सख्त अनुपालन की ज़रूरत
इस व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए, कंपनियों को DGFT के साथ 'एक्सपोर्टर-ऑन-रिकॉर्ड' (EOR) के तौर पर रजिस्टर कराना होगा और एक अलग कानूनी इकाई (legal entity) स्थापित करनी होगी। नियमों का मुख्य उद्देश्य इस मॉडल के दुरुपयोग को रोकना है। उदाहरण के लिए, कंपनियों को अटकलबाजी के लिए स्टॉक जमा करने की मनाही है। यानी, केवल पुष्ट विदेशी ऑर्डर से जुड़े सामान ही खरीदे जा सकते हैं। इसके अलावा, EOR को ट्रेसिबिलिटी (traceability) और एक्सपोर्ट सामानों के फिजिकल सेग्रीगेशन (physical segregation) के लिए एक डिजिटल रिपॉजिटरी (digital repository) बनाए रखनी होगी। भारतीय विक्रेताओं को बचाने के लिए, एक्सपोर्ट के लिए निर्धारित किसी भी इन्वेंट्री को भारतीय घरेलू बाजार में बेचने के लिए इस्तेमाल करना सख्त मना है। इस नई नीति के तहत, EOR को भारतीय विक्रेताओं को सामान स्वीकार होने के सात दिनों के भीतर भुगतान करना होगा, भले ही विदेशी खरीदार से अंतिम भुगतान मिला हो या नहीं।
वैश्विक बाजार में भारत की पैठ
यह नीतिगत बदलाव भारत की वैश्विक डिजिटल व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ाने के बड़े लक्ष्य का एक अहम हिस्सा है। वर्तमान में, भारत का ई-कॉमर्स एक्सपोर्ट 5 अरब डॉलर से भी कम है, जो चीन जैसे देशों की तुलना में बहुत छोटा है। यह उम्मीद की जा रही है कि 2030 तक वैश्विक ई-कॉमर्स व्यापार 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा। ऐसे में, सरकार भारतीय निर्माताओं, खासकर छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए लॉजिस्टिक्स को आधुनिक बनाने और उन्हें वैश्विक सप्लाई चेन से बेहतर ढंग से जोड़ने का प्रयास कर रही है।
व्यवसायों और निवेशकों के लिए असर
निवेशकों और बाजार पर नजर रखने वालों के लिए, इस नीति का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां कंप्लायंस (compliance) की ज़रूरतों को कितनी कुशलता से पूरा कर पाती हैं। एक्सपोर्ट-ओनली ऑपरेशन्स के लिए एक अलग कानूनी इकाई बनाने में अतिरिक्त परिचालन लागत और प्रशासनिक खर्च शामिल होंगे, जिसमें वार्षिक सर्टिफिकेशन (annual certifications) और डिजिटल रिपोर्टिंग (digital reporting) जैसी चीजें भी शामिल हैं। इस बात का भी जोखिम है कि 'एक्सपोर्ट-ओनली' इन्वेंट्री घरेलू बाजार में न जाए, इसके लिए नियामक जांच (regulatory scrutiny) की जा सकती है।
हालांकि यह नीति विकास का एक नया रास्ता खोलती है, कंपनियों को इन कंप्लायंस लागतों का संतुलन उच्च एक्सपोर्ट वॉल्यूम की संभावना के साथ बनाना होगा। बाजार संभवतः लॉजिस्टिक्स फर्मों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म द्वारा इन नियमों को अपनाने की दर पर नजर रखेगा। इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या व्यापार करने में आसानी, नियामकों द्वारा निर्धारित निगरानी और अलगाव की बढ़ी हुई आवश्यकताओं से अधिक फायदेमंद साबित होती है।
