भारत में अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच नेट फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) में **43%** की जोरदार बढ़त दर्ज की गई है, जो **$13.79 बिलियन** तक पहुंच गया है। यह निवेश शेयर बाजार से हुए **$3.71 बिलियन** के आउटफ्लो (FPI) को संभालने में एक बड़े सपोर्ट की तरह काम कर रहा है।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, चालू फाइनेंशियल ईयर के पहले पांच महीनों में भारत ने जबरदस्त विदेशी निवेश आकर्षित किया है। पिछले साल की समान अवधि में यह आंकड़ा $9.62 बिलियन था, जो अब बढ़कर $13.79 बिलियन के पार पहुंच गया है। यह आंकड़ा न केवल ग्रोथ को दर्शाता है, बल्कि बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव के बीच अर्थव्यवस्था की मजबूती को भी बयां करता है।
FDI बनाम पोर्टफोलियो फ्लो: क्या है फर्क?
निवेशकों को यह समझना जरूरी है कि FDI का मतलब है लंबी अवधि का कमिटमेंट। जब विदेशी कंपनियां भारत में फैक्ट्री या इंफ्रास्ट्रक्चर लगाती हैं, तो उनका नजरिया सालों का होता है। इसके उलट, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) वह पैसा है जो ग्लोबल मार्केट के सेंटीमेंट या ब्याज दरों में बदलाव के साथ जल्दी से बाहर निकल जाता है। इस अवधि में जब बाजार से $3.71 बिलियन की निकासी हुई, तब FDI ने उस खालीपन को भरकर देश की वित्तीय स्थिति को स्थिर रखा।
कहां से आ रहा है पैसा?
ज्यादातर निवेश कम्युनिकेशन, मिसलेनियस सर्विसेज और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में हुआ है। सरकार की मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने वाली स्कीमों का असर यहां साफ दिख रहा है। कुल ग्रॉस FDI का करीब 72% निवेश अमेरिका, सिंगापुर और मॉरीशस जैसे देशों से आया है। वहीं, भारतीय कंपनियां भी ग्लोबल मार्केट में विस्तार कर रही हैं और अपना निवेश मुख्य रूप से सिंगापुर, नीदरलैंड और अमेरिका की ओर मोड़ रही हैं।
अगस्त का उतार-चढ़ाव: चिंता की बात या रूटीन?
अगस्त महीने में नेट FDI $3.32 बिलियन रहा, जो जुलाई के $7.34 बिलियन से कम है। हालांकि, इसे किसी ट्रेंड रिवर्सल के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यह मुख्य रूप से कंपनियों द्वारा रीपैट्रिएशन (पूंजी को वापस भेजना) और एसेट सेल की वजह से हुआ है, जो बिजनेस साइकिल का एक सामान्य हिस्सा है। आगे चलकर मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ और ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स पर नजर रखना निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होगा।
