NaBFID MD की बड़ी चेतावनी: भारत को हर साल चाहिए ₹40 लाख करोड़ इंफ्रा खर्च के लिए!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
NaBFID MD की बड़ी चेतावनी: भारत को हर साल चाहिए ₹40 लाख करोड़ इंफ्रा खर्च के लिए!

NaBFID के मैनेजिंग डायरेक्टर राजकिरण राय जी ने कहा है कि भारत को अपनी आर्थिक रफ्तार बनाए रखने के लिए सालाना इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) निवेश को दोगुना करके **₹40 लाख करोड़** तक ले जाना होगा। इसके लिए बैंकों पर निर्भरता कम कर पेंशन और इंश्योरेंस फंड जैसी लॉन्ग-टर्म डोमेस्टिक सेविंग्स (Domestic Savings) पर फोकस करना होगा।

इंफ्रा खर्च दोगुना करने की जरूरत

NaBFID (National Bank for Financing Infrastructure and Development) के मैनेजिंग डायरेक्टर राजकिरण राय जी के मुताबिक, भारत को अपने दीर्घकालिक आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सालाना इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट (Infrastructure Investment) को लगभग ₹40 लाख करोड़ तक बढ़ाना होगा। उन्होंने मुंबई में FIBAC बैंकिंग कॉन्फ्रेंस के दौरान यह बड़ी बात कही।

फिलहाल, भारत इंफ्रा प्रोजेक्ट्स पर सालाना करीब ₹20 लाख करोड़ खर्च करता है। राय का मानना है कि इस खर्च को दोगुना करना मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (Manufacturing Sector) को सपोर्ट करने और सर्विसेज सेक्टर (Services Sector) से हासिल की गई ग्रोथ को बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। इसका मकसद प्रोजेक्ट्स में लगातार और भरोसेमंद फंड फ्लो सुनिश्चित करना है, न कि कभी-कभी पैसा लगाना।

फंड जुटाने की रणनीति

इस बड़े निवेश को जुटाना अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है। राय ने बताया कि इंफ्रा फाइनेंसिंग का पारंपरिक जरिया, यानी बैंक लोन, शायद काफी न हो। भारत के पास ₹125 लाख करोड़ के करीब लॉन्ग-टर्म सेविंग्स (जैसे पेंशन, इंश्योरेंस और प्रॉविडेंट फंड) का बड़ा पूल है, जो हर साल 15-20% की दर से बढ़ रहा है। ये फंड्स लॉन्ग-ड्यूरेशन इंफ्रा एसेट्स (Long-duration Infrastructure Assets) के लिए काफी उपयुक्त हैं, लेकिन फिलहाल इनमें इनका एक्सपोजर (Exposure) बहुत कम है।

रणनीति यह है कि फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस (Financial Institutions) इंफ्रा प्रोजेक्ट्स शुरू करें और फिर इस एक्सपोजर को इन बड़ी डोमेस्टिक सेविंग्स फंड्स समेत बड़े इन्वेस्टर्स (Investors) के एक बड़े बेस में फैलाएं। इससे कमर्शियल बैंकों (Commercial Banks) की बैलेंस शीट्स (Balance Sheets) पर दबाव कम होगा और इंफ्रा फाइनेंसिंग के लिए एक टिकाऊ मॉडल तैयार होगा।

इन्वेस्टर्स के लिए क्या है खास?

यह बदलाव इंफ्रा, कंस्ट्रक्शन (Construction), स्टील (Steel) और सीमेंट (Cement) जैसे सेक्टर्स में एक लॉन्ग-टर्म ट्रेंड का संकेत देता है। इंफ्रा खर्च में लगातार बढ़ोतरी से इन सेक्टर्स में डिमांड बढ़ सकती है। हालांकि, इस रणनीति की सफलता लॉन्ग-टर्म कैपिटल (Long-term Capital) को प्रभावी ढंग से जुटाने और सरकारी प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन (Project Execution) पर निर्भर करेगी।

इन्वेस्टर्स को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इंफ्रा प्रोजेक्ट्स में काफी कैपिटल लगता है और इनमें देरी, लागत बढ़ना और इंटरेस्ट रेट्स (Interest Rates) के प्रति सेंसिटिविटी जैसे जोखिम भी शामिल होते हैं। साथ ही, बॉन्ड मार्केट (Bond Markets) और प्राइवेट कैपिटल (Private Capital) पर निर्भरता के लिए रेगुलेटरी माहौल (Regulatory Environment) का स्थिर होना जरूरी है ताकि इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (Institutional Investors) आकर्षित हों। आने वाले समय में इंफ्रा फंडिंग की पॉलिसी अपडेट्स, प्रोजेक्ट्स के लागू होने की रफ्तार और इंश्योरेंस व पेंशन फंड्स द्वारा लॉन्ग-टर्म एसेट्स में किए जाने वाले एलोकेशन (Allocation) पर नजर रखनी होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.