पूर्व वित्त आयोग के प्रमुख N.K. Singh का कहना है कि भारत को **7-8%** की आर्थिक वृद्धि बनाए रखने के लिए अपनी बचत दर (Savings Rate) को मौजूदा **34%** से बढ़ाकर **40%** करने की जरूरत है। इससे विदेशी फंड पर निर्भरता कम होगी और कंपनियों के लिए सस्ता लोन मिलना आसान हो जाएगा।
विदेशी कर्ज पर निर्भरता होगी कम
भारत की आर्थिक स्थिरता को लेकर N.K. Singh ने एक बड़ा विजन सामने रखा है। उनका मानना है कि बुनियादी ढांचे (Infrastructure) और औद्योगिक विस्तार के लिए भारी निवेश की जरूरत है। अगर घरेलू बचत दर 34% से बढ़कर 38% से 40% के स्तर पर पहुंचती है, तो भारत को विदेशी पूंजी या भारी सरकारी कर्ज पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
निवेशकों के लिए इस लक्ष्य का सबसे बड़ा फायदा 'कॉस्ट ऑफ कैपिटल' (Cost of Capital) में कमी आना है। जब देश के भीतर बचत का बड़ा पूल उपलब्ध होता है, तो कंपनियों को लोन सस्ता मिलता है। इससे कॉर्पोरेट सेक्टर अपनी नई परियोजनाओं, मशीनों की खरीदारी और बिजनेस विस्तार को बिना बैलेंस शीट पर दबाव डाले तेजी से आगे बढ़ा सकता है।
राज्य सरकारों और टैक्स पर फोकस
सरकार का लक्ष्य वित्तीय अनुशासन को सुधारना है। इसके तहत 2031-32 तक राज्यों के कैपिटल स्पेंडिंग को GDP के 2.4% से बढ़ाकर 3% तक ले जाने का रोडमैप तैयार किया गया है। इसके अलावा, टैक्स कलेक्शन बढ़ाने के लिए रेट बढ़ाने के बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बेहतर डेटा एनालिसिस का उपयोग किया जाएगा, ताकि टैक्स बेस को चौड़ा किया जा सके।
यह कोई रातों-रात होने वाला बदलाव नहीं है, बल्कि एक स्ट्रक्चरल रोडमैप है। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी होगी कि सरकार फिस्कल डिसिप्लिन (Fiscal Discipline) पर कैसे काम करती है, क्योंकि यह भविष्य के लॉन्ग-टर्म इंडस्ट्रियल ग्रोथ की नींव साबित हो सकता है।
