भारत अब चिली के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है। इस कदम का मुख्य मकसद अपने एक्सपोर्ट मार्केट को फैलाना और पारंपरिक देशों पर निर्भरता को कम करना है।
निर्यात को वैश्विक पहचान देने की रणनीति
भारत अपने निर्यात के दायरे को बढ़ाने के लिए एक बड़ी कूटनीति पर काम कर रहा है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने पुष्टि की है कि चिली के साथ व्यापक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत अपने अंतिम चरण में है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब सरकार का पूरा ध्यान उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारतीय सामान के लिए प्राथमिकता वाली मार्केट एक्सेस हासिल करने पर है।
किन देशों पर है सरकार की नजर?
चिली के अलावा, कनाडा के साथ भी ट्रेड बातचीत में प्रगति देखी जा रही है। नई दिल्ली अब इक्वाडोर, मिस्र और अफ्रीकी संघ के साथ भी व्यापारिक संबंधों को औपचारिक रूप देने की संभावना तलाश रही है। यह शिफ्ट इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल चंद देशों पर निर्भर रहने के बजाय अपने एक्सपोर्ट बास्केट को सुरक्षित करना चाहता है।
अमेरिका के साथ जटिल बातचीत
जहां कई देशों के साथ समझौते पटरी पर हैं, वहीं अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौता अब भी पेचीदा बना हुआ है। अमेरिकी टैरिफ नीतियों में बदलाव के कारण बातचीत का दौर फिर से शुरू करना पड़ा है। भारतीय अधिकारी यह सुनिश्चित करने पर जोर दे रहे हैं कि कोई भी डील केवल अस्थायी लाभ न दे, बल्कि घरेलू मैन्युफैक्चरर्स को लंबे समय तक प्रतिस्पर्धी बनाए रखे।
निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
निवेशकों के नजरिए से देखें तो ये ट्रेड पैक्ट्स एक्सपोर्ट ग्रोथ के लिए एक मजबूत लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजी हैं। यदि नए बाजारों में टैरिफ 0% या कम होता है, तो इंजीनियरिंग, टेक्सटाइल्स और फार्मा जैसे सेक्टर को बड़ा फायदा हो सकता है। हालांकि, इन समझौतों का असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि फाइनल टैरिफ स्ट्रक्चर क्या होता है और कंपनियां अपनी प्रोडक्शन क्षमता को वैश्विक मांग के अनुरूप कितनी तेजी से स्केल कर पाती हैं।
