भारत सरकार अपने 2016 के 'मॉडल बायलैट्रल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी' (BIT) को अपडेट करने जा रही है। इसका मुख्य मकसद गिरते FDI इनफ्लो में सुधार लाना और निवेशकों के लिए नियमों को अधिक लचीला बनाना है।
भारत सरकार विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को फिर से रफ्तार देने के लिए बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। आंकड़ों पर गौर करें तो, FY20 से FY22 के बीच जहां सालाना औसत FDI करीब $40 बिलियन था, वह FY26 में गिरकर लगभग $7.65 बिलियन पर आ गया है। इस गिरावट को थामने के लिए सरकार अब अपनी पुरानी इन्वेस्टमेंट पॉलिसी की समीक्षा कर रही है।
2016 के पुराने मॉडल से किनारा
निवेशक लंबे समय से 2016 के मॉडल की आलोचना कर रहे थे। इसमें सबसे बड़ी समस्या यह थी कि किसी भी विवाद पर इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन में जाने से पहले निवेशकों को 5 साल तक स्थानीय अदालतों के चक्कर काटने पड़ते थे। यह देरी और अनिश्चितता विदेशी कंपनियों के लिए एक बड़ा 'डिटरेंट' साबित हुई। नए प्रस्तावित बदलावों में UAE और इज़राइल के साथ हुई संधियों की तरह ही लचीलेपन और तेज विवाद निपटान मैकेनिज्म को प्राथमिकता दी जाएगी।
चुनौतीपूर्ण ग्लोबल माहौल
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारतीय इक्विटी मार्केट भारी दबाव में है। सितंबर 2024 से जून 2026 के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय बाजार से $20 बिलियन से अधिक की निकासी की है। इसके पीछे मुख्य कारण ऊंचे वैल्युएशन और अमेरिका व इमर्जिंग मार्केट्स के बीच ब्याज दरों का अंतर रहा है।
अब ग्लोबल फंड्स केवल संधियों की सुरक्षा नहीं, बल्कि 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और पारदर्शिता पर भी नजर रख रहे हैं। सरकार इंश्योरेंस सेक्टर में FDI लिमिट बढ़ाकर और नियमों को सरल बनाकर यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि भारत ग्लोबल कैपिटल के लिए एक स्टेबल और प्रिडिक्टेबल डेस्टिनेशन है।
